Chhath Puja 2025: सूर्य उपासना का चार दिवसीय महापर्व छठ पूजा 2025 मंगलवार को श्रद्धा और भक्ति के साथ संपन्न हुआ। व्रतियों ने प्रातःकालीन बेला में उगते सूर्य को ‘ऊषा अर्घ्य’ अर्पित कर 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत पूरा किया। सुबह 6:27 बजे तक अर्घ्य देने का शुभ समय रहा, जिसके दौरान देशभर के घाटों पर भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी।
दिल्ली के 1300 घाटों पर उमड़ा जनसैलाब
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में इस बार करीब 1300 घाटों पर छठ महापर्व का आयोजन किया गया। यमुना नदी किनारे बने 17 प्रमुख घाटों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिली। ठंडी हवाओं के बावजूद महिलाएं कमर तक जल में खड़ी होकर सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित करती रहीं। इसी तरह मुंबई और ठाणे में भी 80 से अधिक स्थलों पर सामूहिक पूजा का आयोजन हुआ।
विदेशी धरती पर भी छठ की गूंज
अब छठ पूजा की आस्था सीमाओं से परे जा चुकी है। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा, मॉरिशस, सूरीनाम, फिजी और त्रिनिदाद-टोबैगो जैसे देशों में बसे भारतीयों ने सामूहिक रूप से सूर्यदेव की उपासना की। पारंपरिक गीतों और लोकसंगीत के साथ प्रवासी भारतीयों ने विदेशी धरती पर भारतीय संस्कृति की झलक बिखेरी।
चार दिनों की छठ पूजा की परंपरा
- नहाय खाय: घर की सफाई के बाद शुद्ध भोजन के साथ व्रत की शुरुआत।
- खरना: निर्जला व्रत के बाद शाम को गुड़-चावल या रोटी-खीर का प्रसाद ग्रहण।
- संध्या अर्घ्य: डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना।
- ऊषा अर्घ्य: अंतिम दिन उगते सूर्य की आराधना के साथ व्रत का समापन।
समानता और एकता का पर्व
छठ पूजा का सबसे सुंदर पहलू है समानता की भावना। जात-पात, अमीरी-गरीबी या भेदभाव से परे सभी एक साथ खड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते हैं। प्रसाद के रूप में ठेकुआ, केला, सिंघाड़ा, नारियल, अदरक और मौसमी फल बांटे जाते हैं।
पौराणिक कथा
स्कंद पुराण के अनुसार, राजा प्रियव्रत को षष्ठी देवी के आशीर्वाद से पुत्र प्राप्त हुआ था। तब से यह परंपरा चली आ रही है कि संतान सुख और समृद्धि के लिए षष्ठी देवी और सूर्यदेव की आराधना की जाए।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण
ऋग्वेद में वर्णित है कि सूर्य की किरणें शरीर और मन दोनों को शुद्ध करती हैं। सूर्य उपासना से रोग प्रतिरोधक क्षमता, मानसिक ऊर्जा और सकारात्मकता में वृद्धि होती है।
यूनेस्को में शामिल कराने की पहल
भारत सरकार ने छठ पूजा को UNESCO की Intangible Cultural Heritage List में शामिल कराने की दिशा में कदम बढ़ाया है, ताकि इस प्राचीन भारतीय पर्व को वैश्विक पहचान मिल सके।