इंटरनेशनल डेस्कः पूर्वी अफ्रीका का देश तंजानिया इन दिनों भारी राजनीतिक और सामाजिक संकट से जूझ रहा है। 29 अक्टूबर को हुए राष्ट्रपति चुनावों के बाद हालात तेजी से बिगड़ गए हैं। चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी चामा चा मापिंदुजी (Chama Cha Mapinduzi) की नेता और मौजूदा राष्ट्रपति सामिया सुलुहु हसन (Samia Suluhu Hassan) ने फिर से चुनाव लड़ा, लेकिन मतदान से पहले ही विवाद गहराने लगे थे।
विपक्षी दलों का आरोप है कि दो प्रमुख प्रत्याशियों को नामांकन प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया, जिससे निष्पक्ष चुनाव की संभावना खत्म हो गई। विपक्ष ने इसे “लोकतंत्र की खुली लूट” और “चुनाव चोरी” करार दिया। इसी के विरोध में देशभर में प्रदर्शन भड़क उठे, जो जल्द ही हिंसक रूप ले चुके हैं।
तीन दिनों में लगभग 700 लोगों की मौत
मुख्य विपक्षी पार्टी चाडेमा (CHADEMA) का दावा है कि पुलिस और सेना की कार्रवाई में अब तक करीब 700 नागरिक मारे गए हैं। दर्जनों शहरों में झड़पें जारी हैं, जिनमें दर एस सलाम, अरुशा और म्वांजा सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। विपक्ष ने कहा है कि मरने वालों की संख्या इससे भी अधिक हो सकती है, जबकि सरकार ने अब तक आधिकारिक तौर पर कोई आंकड़ा जारी नहीं किया है।
पूरा देश सैन्य नियंत्रण में, इंटरनेट बंद
स्थिति बिगड़ने पर सरकार ने देशव्यापी नाइट कर्फ्यू लागू कर दिया है। इंटरनेट और मोबाइल सेवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। साथ ही सेना को सड़कों पर उतारा गया है, ताकि प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर किया जा सके।
मीडिया पर रोक, सेंसरशिप बढ़ी
हिंसा की बढ़ती घटनाओं के बीच सरकार ने स्थानीय मीडिया पर सख्त पाबंदियां लगा दी हैं। कई समाचार चैनलों को प्रसारण रोकने के आदेश दिए गए हैं और विदेशी पत्रकारों को रिपोर्टिंग से रोकने की भी कोशिश की जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि तंजानिया का यह संकट देश के लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने भी हिंसा और दमन पर गंभीर चिंता जताई है।