नई दिल्ली : स्वयंभू आध्यात्मिक गुरु आसाराम को इलाज के आधार पर मिली अस्थायी राहत अब कानूनी चुनौती में घिर गई है। दुष्कर्म पीड़िता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर मांग की है कि आसाराम को दी गई 6 महीने की अंतरिम जमानत तुरंत रद्द की जाए।
पीड़िता का कहना है कि हाईकोर्ट द्वारा दिया गया यह फैसला उसकी सुरक्षा और न्याय प्रक्रिया—दोनों के लिए खतरा है।
6 महीने की जमानत पर क्यों उठे सवाल?
राजस्थान हाईकोर्ट ने 29 अक्टूबर को 84 वर्षीय आसाराम की स्वास्थ्य समस्याओं को देखते हुए 6 महीने की अंतरिम जमानत मंजूर की थी। इसके बाद गुजरात हाईकोर्ट ने भी 6 नवंबर को इसी आदेश को आधार बनाकर उसे अस्थायी राहत दे दी।
अब सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में इसी राहत को चुनौती दी गई है।
गुजरात सरकार पहले ही कर चुकी थी विरोध
गुजरात सरकार ने हाईकोर्ट में स्पष्ट कहा था कि आसाराम को जेल से बाहर भेजने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि जो चिकित्सा सुविधाएँ जोधपुर में उपलब्ध नहीं थीं, वे अहमदाबाद की साबरमती सेंट्रल जेल में आसानी से उपलब्ध कराई जा सकती हैं।
इसके बावजूद कोर्ट ने स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए अंतरिम जमानत दे दी थी।
दो मामलों में उम्रकैद—लंबी कानूनी लड़ाई
आसाराम पर दो अलग-अलग दुष्कर्म मामलों में आजीवन कारावास की सज़ा चल रही है—
- जोधपुर केस (2013): नाबालिग के साथ दुष्कर्म का मामला
- गांधीनगर केस (2023): महिला शिष्या के साथ कई वर्षों तक यौन उत्पीड़न
- दोनों मामलों में अदालतों ने उसे दोषी करार दिया है।
अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी निगाहें
सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई जारी है। यदि अदालत पीड़िता की मांग स्वीकार करती है, तो आसाराम को दी गई अंतरिम जमानत रद्द हो सकती है और उसे फिर से जेल भेजा जाएगा।
कानूनी विशेषज्ञ भी मानते हैं कि यह मामला आने वाले दिनों में बड़ा मोड़ ले सकता है।