रिसाली/दुर्ग। सात दिवसीय भागवत कथा के दूसरे दिन कथावाचक पं. भूपत नारायण शुक्ला ने राजा परीक्षित की पावन कथा का वर्णन किया। कथा के दौरान उन्होंने बताया कि राजा परीक्षित कुरु वंश के पराक्रमी राजा थे, जिनका जन्म युद्धाभ्यास के बीच हुआ था और जिन्हें स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के वरद हाथ का आशीर्वाद प्राप्त था।
कथावाचक ने कहा कि एक बार दुर्भाग्यवश ऋषि शमीक के पुत्र ऋषिश्रृंग ने परीक्षित को श्राप दे दिया कि सातवें दिन तक्षक नाग के डंसने से उनका निधन होगा। श्राप की घड़ी नजदीक आते ही राजा परीक्षित ने राजमहल का मोह त्यागकर गंगा तट पर उपवास सहित श्रीशुकदेव जी से भागवत श्रवण का निर्णय लिया।

शुकदेव जी द्वारा सुनाई गई यही सप्तदिवसीय भागवत कथा आज भी मोक्षदायिनी मानी जाती है। कथा के अंत में पं. भूपत नारायण शुक्ला ने कहा कि परीक्षित की कथा हमें जीवन की अनिश्चितता, क्षणभंगुरता और ईश्वर भक्ति की महत्ता का संदेश देती है।
कथा पंडाल में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और “हरि बोल” के जयघोष से वातावरण भक्तिमय बना रहा।