पश्चिम बंगाल में SIR पर सियासी टकराव, चुनाव आयोग और TMC आमने-सामने

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर निर्वाचन आयोग और राज्य की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बीच टकराव और गहरा गया है। दोनों पक्षों के बीच जारी मतभेद अब कानूनी मोड़ लेने की ओर बढ़ते दिख रहे हैं।

निर्वाचन आयोग ने तृणमूल कांग्रेस की उस मांग को अस्वीकार कर दिया है, जिसमें पार्टी ने अपने बूथ लेवल एजेंट्स (BLA) को मतदाता सूची के मसौदे पर होने वाली दावों और आपत्तियों की सुनवाई प्रक्रिया में शामिल करने की अनुमति मांगी थी। आयोग का कहना है कि ऐसा करने से प्रक्रिया जटिल और अव्यवस्थित हो सकती है।

राज्य में एसआईआर की प्रक्रिया तीन चरणों में संचालित की जा रही है। पहले चरण में घर-घर जाकर सर्वे, फॉर्मों का वितरण, विवरण भरवाना और डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने का काम पूरा हो चुका है, जिसके बाद ड्राफ्ट मतदाता सूची प्रकाशित कर दी गई है। अब दूसरा चरण शुरू हो चुका है, जिसमें नागरिक अपनी दावों और आपत्तियों को दर्ज करा सकते हैं। यह चरण 15 जनवरी 2026 तक चलेगा।

निर्वाचन आयोग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि यदि किसी एक राजनीतिक दल के एजेंटों को सुनवाई में शामिल होने की अनुमति दी जाती है, तो सभी मान्यता प्राप्त दलों के लिए भी यही सुविधा देनी पड़ेगी। इससे सुनवाई कक्षों में अत्यधिक भीड़ जमा हो सकती है, जहां पहले से ही पंजीकरण अधिकारी, सहायक अधिकारी, पर्यवेक्षक और संबंधित मतदाता मौजूद रहते हैं।

आयोग का तर्क है कि सुनवाई की प्रक्रिया पूरी तरह प्रशासनिक और दस्तावेज आधारित होती है, जिसमें राजनीतिक हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है। बीएलए की मौजूदगी से विभिन्न दल अपने-अपने तर्क प्रस्तुत करने लगेंगे, जिससे निष्पक्ष और समयबद्ध निर्णय लेना मुश्किल हो सकता है।

वहीं, तृणमूल कांग्रेस ने आयोग के फैसले पर सवाल उठाते हुए इसे पक्षपातपूर्ण करार दिया है। पार्टी का आरोप है कि कुछ राष्ट्रीय दलों के पास पर्याप्त संख्या में बीएलए नहीं हैं और इसी कारण ऐसी व्यवस्था लागू की जा रही है। टीएमसी का कहना है कि यह निर्णय 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची की पारदर्शिता को प्रभावित कर सकता है।

निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि वह किसी भी राजनीतिक दल की संगठनात्मक क्षमता को ध्यान में रखकर निर्णय नहीं ले सकता। आयोग के अनुसार, सभी दलों के लिए एक जैसे नियम लागू करना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है, ताकि पूरी प्रक्रिया सुचारू, नि00ष्पक्ष और व्यवस्थित ढंग से पूरी की जा सके।

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