नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती प्रक्रियाओं से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए बड़ा संदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने साफ कहा है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से आने वाले वे अभ्यर्थी, जो सामान्य वर्ग की निर्धारित कट-ऑफ से अधिक अंक हासिल करते हैं और किसी तरह की विशेष छूट या रियायत का लाभ नहीं लेते, उन्हें केवल आरक्षित श्रेणी तक सीमित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट के अनुसार, ऐसे उम्मीदवारों को चयन प्रक्रिया के शुरुआती चरण, यानी शॉर्टलिस्टिंग के दौरान भी ओपन कैटेगरी में गिना जाना जरूरी है। केवल जाति या वर्ग के आधार पर उन्हें सामान्य श्रेणी से बाहर रखना संविधान की भावना के खिलाफ होगा।
राजस्थान हाईकोर्ट की भर्ती से जुड़ा था मामला
यह मामला राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा वर्ष 2022 में निकाली गई भर्ती से जुड़ा है, जिसमें जूनियर ज्यूडिशियल असिस्टेंट और क्लर्क ग्रेड-II के कुल 2,756 पदों पर नियुक्ति की जानी थी। चयन प्रक्रिया में लिखित परीक्षा और कंप्यूटर आधारित टाइपिंग टेस्ट शामिल था।
चयन प्रक्रिया को लेकर उठा था विवाद
भर्ती नियमों के तहत प्रत्येक श्रेणी में उपलब्ध पदों के अनुपात में उम्मीदवारों को टाइपिंग टेस्ट के लिए बुलाया जाना था। इसी दौरान यह सवाल उठा कि आरक्षित वर्ग के वे अभ्यर्थी, जो सामान्य श्रेणी की मेरिट में स्थान बनाते हैं, उन्हें किस कैटेगरी में माना जाए। इस पर राजस्थान हाईकोर्ट ने मेरिट को प्राथमिकता देते हुए फैसला सुनाया था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा है।
भविष्य की भर्तियों पर पड़ेगा असर
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से देशभर की सरकारी भर्तियों में मेरिट आधारित चयन को मजबूती मिलेगी और योग्य उम्मीदवारों के साथ किसी भी तरह का भेदभाव नहीं किया जा सकेगा।