कीव। रूस-यूक्रेन युद्ध को थामने के प्रयासों के बीच यूरोप की कूटनीति ने एक नया मोड़ ले लिया है। हाल ही में यूक्रेन नेतृत्व और प्रमुख यूरोपीय देशों के बीच हुई उच्चस्तरीय बातचीत में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर एक नई रणनीति पर सहमति बनी है। इस पहल के तहत ब्रिटेन और फ्रांस ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि दोनों देशों के बीच युद्धविराम लागू भी होता है, तब भी उनकी सैन्य मौजूदगी यूक्रेन में बनी रहेगी।
सूत्रों के मुताबिक, इस रणनीतिक पहल को लेकर ब्रिटेन और फ्रांस ने एक साझा आशय पत्र (डिक्लेरेशन ऑफ इंटेंट) पर हस्ताक्षर किए हैं। इसका उद्देश्य भविष्य में किसी भी संभावित रूसी आक्रमण को रोकने के लिए यूक्रेन को मजबूत सुरक्षा समर्थन देना है। समझौते के तहत दोनों देश यूक्रेन में सैन्य ठिकानों और लॉजिस्टिक हब स्थापित कर सकते हैं, ताकि हथियारों और रक्षा संसाधनों की आपूर्ति को सुरक्षित रखा जा सके।
इस कदम को यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की की उस चिंता का जवाब माना जा रहा है, जिसमें उन्होंने आशंका जताई थी कि रूस किसी भी युद्धविराम का फायदा उठाकर अपनी सेना को फिर से संगठित कर सकता है। ऐसे में मित्र देशों की सेनाओं की मौजूदगी यूक्रेन के लिए एक ठोस सुरक्षा गारंटी के रूप में देखी जा रही है।
नई योजना के अनुसार, ब्रिटेन, फ्रांस और अन्य सहयोगी देशों की सेनाएं यूक्रेन की हवाई और समुद्री सीमाओं की निगरानी करेंगी। इसके साथ ही वे यूक्रेनी सेना को आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षण और रणनीतिक सहयोग प्रदान करने में भी भूमिका निभाएंगी, ताकि भविष्य में किसी भी खतरे का प्रभावी तरीके से सामना किया जा सके।
हालांकि, यूरोपीय नेताओं ने यह भी साफ किया है कि स्थायी शांति तभी संभव है जब रूस गंभीरता से बातचीत की मेज पर आए। मौजूदा हालात और रूस की सैन्य गतिविधियों को देखते हुए फिलहाल व्यापक शांति समझौते की राह आसान नहीं मानी जा रही है।
इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका की भूमिका भी अहम बताई जा रही है। हाल ही में हुई एक बहुपक्षीय बैठक, जिसमें करीब 35 देशों ने भाग लिया, उसमें यह सहमति बनी कि किसी भी संभावित युद्धविराम की निगरानी और उसके पालन की जिम्मेदारी अमेरिका के नेतृत्व में निभाई जाएगी, जिसमें यूरोपीय देशों का सहयोग शामिल रहेगा। राष्ट्रपति जेलेंस्की ने इस पहल का स्वागत करते हुए सहयोगी देशों के समर्थन के लिए आभार जताया है।
यह नई रणनीति सिर्फ युद्ध रोकने का प्रयास नहीं है, बल्कि इसे लंबे समय तक यूक्रेन की संप्रभुता और सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक अहम भू-राजनीतिक कदम के तौर पर देखा जा रहा है।