नई दिल्ली / जिनेवा: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने सरकारों को जनस्वास्थ्य से जुड़ा अहम सुझाव देते हुए कहा है कि मीठे पेय पदार्थों, फ्रूट जूस और शराब पर कर (टैक्स) बढ़ाना समय की जरूरत है। संगठन का मानना है कि इन उत्पादों पर सख्ती करने से मोटापा, डायबिटीज, दिल की बीमारियां, कैंसर और सड़क दुर्घटनाओं जैसी समस्याओं पर प्रभावी रोक लगाई जा सकती है, खासकर बच्चों और युवाओं में।
सस्ते होते जा रहे हैं हानिकारक उत्पाद
WHO की हालिया वैश्विक रिपोर्टों में बताया गया है कि दुनिया के कई देशों में टैक्स नीति कमजोर होने के कारण शक्कर युक्त ड्रिंक्स और शराब की कीमतें लगातार घट रही हैं। नतीजतन इनका सेवन तेजी से बढ़ रहा है, जिससे स्वास्थ्य तंत्र पर भारी दबाव पड़ रहा है।
कई हाई-शुगर ड्रिंक्स टैक्स के दायरे से बाहर
रिपोर्ट के मुताबिक, 100 से ज्यादा देश सोडा जैसे मीठे पेय पर टैक्स लगाते हैं, लेकिन 100% फ्रूट जूस, फ्लेवर्ड दूध, रेडी-टू-ड्रिंक कॉफी और चाय जैसे उत्पाद अक्सर टैक्स से बाहर रहते हैं। औसतन, एक मीठे सोडा की कीमत में टैक्स की हिस्सेदारी सिर्फ 2 प्रतिशत के आसपास होती है, जो बेहद कम मानी जा रही है।
महंगाई के साथ टैक्स न बढ़ाना बड़ी कमजोरी
WHO ने यह भी रेखांकित किया कि बहुत कम देश ऐसे हैं जो महंगाई दर के अनुसार टैक्स में संशोधन करते हैं। इससे समय के साथ ये उत्पाद और ज्यादा किफायती बन जाते हैं। इसका सीधा फायदा कंपनियों को होता है, जबकि बीमारियों का आर्थिक और सामाजिक बोझ सरकारों और समाज को उठाना पड़ता है।
हेल्थ टैक्स को बताया सबसे असरदार उपाय
WHO के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अधानोम गेब्रेयेसस ने कहा कि स्वास्थ्य से जुड़े टैक्स न केवल बीमारियों की रोकथाम में कारगर हैं, बल्कि इससे सरकारों को सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अतिरिक्त संसाधन भी मिलते हैं।
शराब पर भी जताई चिंता
एक अलग रिपोर्ट में WHO ने बताया कि 2022 के बाद से कई देशों में शराब की कीमतें या तो घटी हैं या स्थिर बनी हुई हैं, जबकि इसके दुष्परिणाम स्पष्ट हैं। दुनिया के 167 देशों में शराब पर टैक्स है, वहीं 12 देशों में इस पर पूरी तरह प्रतिबंध है। संगठन के अनुसार, शराब सस्ती होने से हिंसा, चोट और गंभीर बीमारियों की घटनाएं बढ़ती हैं।
2035 तक सख्त टैक्स नीति की अपील
WHO ने सभी देशों से आग्रह किया है कि वे 2035 तक तंबाकू, शराब और मीठे पेय पदार्थों को कम किफायती बनाने के लिए मजबूत टैक्स सिस्टम लागू करें। संगठन का कहना है कि ऐसी नीतियां लोगों की सेहत की रक्षा करने के साथ-साथ लंबे समय में स्वास्थ्य खर्च को भी कम कर सकती हैं।