भारत-चीन-रूस की नई रणनीति, डॉलर के विकल्प के तौर पर आया BRICS डिजिटल पेमेंट सिस्टम

नई दिल्ली :  वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में BRICS देशों की बढ़ती सक्रियता लंबे समय से अमेरिका की चिंता का कारण रही है। भारत, चीन और रूस जैसे प्रभावशाली देशों के नेतृत्व वाला यह समूह अब अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में बड़ा बदलाव लाने की तैयारी में है। BRICS देश एक ऐसे डिजिटल भुगतान ढांचे पर काम कर रहे हैं, जो अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम कर सकता है और वैश्विक भुगतान प्रणाली में एक नया विकल्प पेश कर सकता है।

साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हो सकता है आपसी व्यापार

जानकारी के मुताबिक, BRICS के भीतर एक कॉमन डिजिटल पेमेंट सिस्टम विकसित करने की दिशा में चर्चा तेज हो गई है। इस प्रणाली के जरिए भारत, चीन और रूस की सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) को तकनीकी रूप से जोड़ा जाएगा। इससे सदस्य देशों के बीच होने वाले आयात–निर्यात का भुगतान सीधे उनकी अपनी डिजिटल मुद्राओं में संभव हो सकेगा, बिना डॉलर या किसी पश्चिमी भुगतान नेटवर्क के हस्तक्षेप के।

नई मुद्रा नहीं, नई व्यवस्था की तैयारी

हाल के महीनों में BRICS की साझा करेंसी को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं, लेकिन अब संकेत साफ हैं कि समूह किसी नई मुद्रा को लॉन्च करने के बजाय एक मजबूत डिजिटल भुगतान तंत्र विकसित करने पर फोकस कर रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य डॉलर आधारित भुगतान प्रणाली और SWIFT जैसे अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क पर निर्भरता को कम करना है।
गौरतलब है कि इस साल BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी भारत करने जा रहा है, जिससे इस पहल को आगे बढ़ाने में उसकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

डिजिटल रुपया, युआन और रूबल होंगे आपस में कनेक्ट

प्रस्तावित मॉडल के तहत भारत का ई-रुपया, चीन का डिजिटल युआन और रूस का डिजिटल रूबल एक साझा तकनीकी प्लेटफॉर्म से जुड़े रहेंगे। हालांकि, हर देश अपनी डिजिटल मुद्रा पर पूर्ण नियंत्रण बनाए रखेगा। बदलाव केवल भुगतान के तरीके में होगा, जिससे लेनदेन तेज, सुरक्षित और कम खर्चीला बन सकेगा। इस प्रणाली के लागू होने के बाद BRICS देशों को आपसी व्यापार के लिए न तो डॉलर की जरूरत होगी और न ही डॉलर आधारित चैनलों पर निर्भर रहना पड़ेगा।

भारत की भूमिका क्यों मानी जा रही है निर्णायक

इस पूरी पहल में भारत को एक अहम कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। भारत का दृष्टिकोण है कि अलग-अलग मुद्राओं को एक करने की बजाय भुगतान प्रणालियों को जोड़ना ज्यादा व्यावहारिक और स्थायी समाधान है। इसकी प्रेरणा भारत का घरेलू डिजिटल भुगतान ढांचा UPI है, जिसने कम समय में देश में डिजिटल लेनदेन की तस्वीर बदल दी है।

इसके अलावा, भारत को रूस के साथ रुपये में व्यापार का अनुभव भी रहा है, जहां भुगतान संतुलन की समस्या सामने आई थी। साझा बहुपक्षीय डिजिटल सिस्टम बनने से भविष्य में ऐसी असमानताओं से बचा जा सकेगा।

कैसे काम करेगा नया डिजिटल भुगतान मॉडल

BRICS का यह डिजिटल पेमेंट सिस्टम दो प्रमुख तकनीकी सिद्धांतों पर आधारित होगा।
पहला, सेटलमेंट मैकेनिज्म, जिसमें हर लेनदेन का तुरंत भुगतान करने के बजाय तय अवधि में कुल आयात–निर्यात का हिसाब लगाकर केवल शुद्ध अंतर राशि का निपटान किया जाएगा। इससे नकदी दबाव और लेनदेन लागत दोनों कम होंगी।
दूसरा, फॉरेक्स स्वैप व्यवस्था, जिसके तहत जरूरत पड़ने पर सदस्य देशों के सेंट्रल बैंक आपसी सहमति से मुद्राओं की अदला-बदली कर सकेंगे, ताकि भुगतान संतुलन बना रहे।

डॉलर से दूरी क्यों बना रहे हैं BRICS देश

डॉलर पर निर्भरता घटाने की सोच BRICS देशों में लंबे समय से मौजूद है। रूस को SWIFT सिस्टम से बाहर किए जाने और उसके सैकड़ों अरब डॉलर के विदेशी भंडार फ्रीज होने के बाद कई देशों ने इसे एक चेतावनी के रूप में देखा। इससे पहले ईरान, क्यूबा और उत्तर कोरिया जैसे देशों पर भी इसी तरह के वित्तीय प्रतिबंध लगाए जा चुके हैं।

ऐसे में BRICS का यह डिजिटल भुगतान ढांचा एक वैकल्पिक प्रणाली के रूप में उभर सकता है, जिससे किसी वैश्विक संकट, प्रतिबंध या राजनीतिक दबाव की स्थिति में सदस्य देशों का आपसी व्यापार बाधित न हो।

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