मुंबई। इनकम टैक्स विभाग टैक्स फाइलिंग प्रक्रिया को सरल और आधुनिक बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रहा है। विभाग ने इनकम टैक्स नियमों का नया मसौदा (ड्राफ्ट) जारी किया है, जिसमें टैक्स से जुड़े लगभग सभी प्रमुख फॉर्म्स की नंबरिंग और संरचना में बदलाव का प्रस्ताव है। यह बदलाव आगामी इनकम टैक्स एक्ट 2025 के लागू होने से पहले किया जा रहा है, जो 1 अप्रैल से प्रभावी होगा।
क्यों जरूरी था बदलाव
अब तक इनकम टैक्स से जुड़े फॉर्म्स समय-समय पर संशोधन के चलते काफी जटिल हो चुके थे। अलग-अलग नियमों और वर्षों में बदली गई नंबरिंग के कारण टैक्सपेयर्स, चार्टर्ड अकाउंटेंट्स और कंपनियों को फॉर्म भरने में भ्रम की स्थिति का सामना करना पड़ता था। नई व्यवस्था में फॉर्म्स को एक तार्किक क्रम में रखा गया है, जिससे जानकारी भरना और समझना दोनों आसान होगा।
डिजिटल सिस्टम से बेहतर तालमेल
नए ड्राफ्ट नियमों के तहत फॉर्म्स को डिजिटल टैक्स सिस्टम के अनुरूप तैयार किया गया है। इससे टैक्स डेटा का रीयल-टाइम मिलान, जांच और प्रोसेसिंग तेज होगी। हालांकि, इसके चलते नियोक्ताओं, टैक्स सलाहकारों और कंपनियों को अपने सॉफ्टवेयर और आंतरिक सिस्टम में जरूरी बदलाव करने होंगे।
कई फॉर्म्स को किया गया मर्ज
ड्राफ्ट के अनुसार, जिन फॉर्म्स का उपयोग सबसे अधिक होता है, उन्हें या तो एक साथ जोड़ दिया गया है या उनकी नई नंबरिंग तय की गई है। उदाहरण के तौर पर—
- टैक्स ऑडिट से जुड़े अलग-अलग फॉर्म्स को अब एक ही नए फॉर्म में समाहित किया गया है।
- ट्रांसफर प्राइसिंग और अंतरराष्ट्रीय टैक्स से जुड़े फॉर्म्स को भी नए नंबर दिए गए हैं।
- मिनिमम अल्टरनेट टैक्स (MAT) और टैक्स रेजिडेंसी सर्टिफिकेट जैसे मामलों में भी पुराने फॉर्म्स की जगह नए फॉर्म्स लागू होंगे।
टीडीएस-टीसीएस और अन्य बदलाव
ड्राफ्ट में टीडीएस और टीसीएस से जुड़े कई फॉर्म्स की पहचान भी बदली गई है। सैलरी टीडीएस सर्टिफिकेट, टीडीएस रिटर्न और टीसीएस रिटर्न सभी के लिए नए फॉर्म नंबर तय किए गए हैं। इसके अलावा, सालाना टैक्स स्टेटमेंट और वित्तीय लेनदेन की जानकारी देने वाले फॉर्म्स को भी नए नाम और नंबर मिलेंगे।
विदेश भेजे जाने वाले पैसों (फॉरेन रेमिटेंस) से जुड़े फॉर्म्स में भी संशोधन किया गया है, ताकि अंतरराष्ट्रीय लेनदेन की रिपोर्टिंग ज्यादा स्पष्ट और पारदर्शी हो सके।
टैक्सपेयर्स को क्या फायदा
विशेषज्ञों का मानना है कि नई फॉर्म संरचना से टैक्स रिटर्न भरने की प्रक्रिया कहीं ज्यादा सहज होगी। एक ही जानकारी बार-बार भरने की जरूरत कम होगी, नियमों में एकरूपता आएगी और टैक्सपेयर्स के लिए अनुपालन (Compliance) आसान बनेगा। कुल मिलाकर, यह बदलाव टैक्स सिस्टम को ज्यादा पारदर्शी, डिजिटल और यूजर-फ्रेंडली बनाने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।