‘अहंकार’ शब्द का आरंभ “अहं” से होता है, जिसका अर्थ है ‘मैं’। जब किसी व्यक्ति के मन में यह भावना जन्म लेती है कि “मैं ही सर्वोच्च हूं, मुझसे बड़ा कोई नहीं,” तभी उसके पतन की कहानी शुरू हो जाती है।
द्वापर युग में सहस्रबाहु नामक एक राजा था, जिसकी शक्ति और बल के लिए संसार में कोई सानी नहीं था। परंतु उसके हृदय में अहंकार का बीज इतना प्रबल हो गया कि उसने स्वयं भगवान शिव से युद्ध करने का विचार किया। शिव ने उसे चेताया कि उसका पतन निकट है, फिर भी राजा अपनी अहं भरी महत्वाकांक्षा में डूबा रहा। अंततः, भगवान श्री कृष्ण के हाथों उसे युद्ध में पराजित होना पड़ा और उसका अभिमान धराशायी हो गया।
इसी प्रकार, रावण विद्वान और शक्तिशाली होने के बावजूद अहंकार का शिकार हुआ। अपने बल और मायावी विद्या के कारण उसने माता सीता का हरण किया। इसका परिणाम यह हुआ कि उसका वंश और राज्य दोनों नष्ट हो गए और अंत में उसका सिर भगवान राम के चरणों में पड़ा। यही दर्शाता है कि अहंकार का नाश अवश्य होता है और भगवान का सबसे प्रिय कार्य अहंकारियों को नीचा करना है।
एक कथा इस सिद्धांत को और स्पष्ट करती है। एक नदी के किनारे एक सुंदर फूल खिलता था। वह फूल नदी के किनारे पड़े पत्थर को देखकर उसका मजाक उड़ाता और कहता, “तुम तो हमेशा पानी में पड़े रहते हो, धारा तुम्हें दिन-रात ठोकर मारती रहती है। देखो, मैं कितना सुंदर और आत्मविश्वासी हूं।” पत्थर चुपचाप यह सब सुनता रहा।
समय बीतने पर वह पत्थर शालिग्राम का रूप धारण कर गया। किसी भक्ति भाव वाले व्यक्ति ने उसे उठाकर अपने पूजा स्थल में प्रतिष्ठित किया। पूजा के समय वही फूल शालिग्राम के चरणों में रखा गया। अपने आप को पत्थर के चरणों में पाकर फूल को अपनी अहंकारपूर्ण प्रवृत्ति का अहसास हुआ। पत्थर चुपचाप मुस्कुराता रहा, यह देखकर कि कैसे अहंकार खुद अपने पैरों तले दब गया।
इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अहंकार केवल मनुष्य को नहीं, बल्कि उसकी सोच और दृष्टि को भी नीचा कर देता है। भगवान का प्रिय आहार वास्तव में अहंकारियों का विनम्र होना है, क्योंकि अहंकार मिटने पर ही वास्तविक भक्ति और ज्ञान का जन्म होता है।