नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने विदेशी मुद्रा बाजार में बढ़ती अस्थिरता को देखते हुए बैंकों से फॉरेक्स लेन-देन और पोजीशन का विस्तृत डाटा मांगा है। केंद्रीय बैंक का उद्देश्य यह पता लगाना है कि कहीं बड़ी संख्या में भारतीय रुपये के खिलाफ सट्टेबाजी तो नहीं हो रही है।
पिछले छह महीनों में रुपये ने डॉलर के मुकाबले कमजोरी दिखाई है। इस दौरान रुपया लगभग 88 रुपये प्रति डॉलर से गिरकर 92 रुपये के आसपास पहुंच गया। शुक्रवार को रुपया 91.74 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। RBI का यह कदम बाजार में अस्थिरता को नियंत्रित करने और स्थिति की सही तस्वीर समझने के लिए उठाया गया है।
रुपये पर दबाव के कारण:
विशेषज्ञों का कहना है कि रुपये में गिरावट के पीछे कई वजहें हैं। बड़े कॉरपोरेट घराने भविष्य के आयात के लिए पहले से डॉलर खरीद रहे हैं। इसके अलावा ऑफशोर नॉन-डिलिवरेबल फॉरवर्ड (NDF) और फॉरवर्ड मार्केट में आर्बिट्राज डील्स बढ़ रही हैं। बैंक भी अपनी तय सीमा के भीतर ट्रेडिंग पोजीशन बढ़ा रहे हैं। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, चालू खाता घाटा और विदेशी निवेश प्रवाह में कमी भी रुपया कमजोर होने का कारण हैं। हालिया भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से थोड़ी राहत मिली, लेकिन पश्चिम एशिया में तनाव के कारण दबाव बना हुआ है।
बैंकों से मांगी गई जानकारी:
RBI ने बैंकों को निर्देश दिया है कि वे स्पॉट, फॉरवर्ड और ऑफशोर NDF बाजार में 10 मिलियन डॉलर से अधिक के सौदों का पूरा विवरण दें। इसमें ग्राहक का नाम, डॉलर खरीदने या बेचने का उद्देश्य, ओपन पोजीशन और इंटर-बैंक बाजार में कुल खरीद-बिक्री शामिल है।
RBI की रणनीति बनाने में मदद:
विशेषज्ञों के अनुसार यह डेटा RBI को बाजार गतिविधियों को समझने और रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने में मदद करेगा। बैंकिंग जानकारों का कहना है कि RBI का यह कदम सट्टेबाजी को सीमित करने का संकेत भी माना जाता है। फिलहाल RBI किसी विशेष स्तर पर रुपये को बचाने की रणनीति नहीं अपना रहा है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर फॉरवर्ड मार्केट में बाय-सेल स्वैप जैसे उपाय किए जा सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक तनाव और विदेशी निवेश में कमजोरी बनी रहती है, तो आने वाले समय में भी रुपये पर दबाव बना रह सकता है।