दुर्ग। जिले के समोदा गांव में बड़े पैमाने पर हो रही अफीम की खेती के खुलासे ने छत्तीसगढ़ की कानून व्यवस्था और प्रशासनिक सतर्कता पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। लगभग 8 करोड़ रुपये की अनुमानित कीमत वाली इस अवैध खेती को लेकर अब हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की कमेटी से जांच कराने की मांग उठने लगी है।इस मामले को लेकर आम आदमी पार्टी ने सोमवार को दुर्ग कलेक्ट्रेट में ज्ञापन सौंपा।
इस मामले में आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाया है कि क्या अफीम की इतनी बड़ी फसल रातों-रात तैयार हो गई? अफीम के पौधों की ऊंचाई और फैलाव साफ बताते हैं कि यह कई महीनों की मेहनत का नतीजा है। ऐसे में जिला प्रशासन और पुलिस इंटेलिजेंस को इसकी भनक तक न लगना बेहद हैरान करने वाला है। जानकार इसे सरकारी तंत्र की बड़ी विफलता मान रहे हैं।

धान खरीदी के कड़े पहरे में कैसे छिपी रही अफीम?
सबसे बड़ा सवाल कृषि विभाग, पटवारी, आर.आई. और तहसीलदारों की कार्यप्रणाली पर है। हाल ही में पूरे प्रदेश में धान खरीदी का कार्य चला, जिसके लिए राजस्व अमले ने एक-एक खेत के रकबे और फसल की बारीकी से जांच की थी। जब सरकारी तंत्र हर खेत की गिरदावरी (पैमाइश) कर रहा था, तब समोदा के खेत में लहलहाती अफीम की फसल अधिकारियों की नजरों से कैसे बच गई? यह चूक है या जानबूझकर की गई अनदेखी?
बड़े ‘सियासी संरक्षण’ की आशंका
प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए यह अंदेशा जताया जा रहा है कि बिना किसी बड़े राजनैतिक संरक्षण और रसूखदार सफेदपोशों के हाथ के बिना इतनी बड़ी अवैध खेती संभव नहीं है। पुलिस ने अब तक जिन लोगों को पकड़ा है, उन्हें केवल ‘मोहरा’ माना जा रहा है। असली सरगना और मास्टरमाइंड अभी भी पर्दे के पीछे हैं, जिन्हें सत्ता या रसूख का कवच प्राप्त होने की चर्चाएं जोरों पर हैं।
न्यायिक जांच की मांग
प्रशासन का दावा है कि खेती 5-6 महीनों से चल रही थी, लेकिन स्थानीय सूत्रों और फसल की स्थिति को देखते हुए इस दावे पर भी संदेह जताया जा रहा है। निष्पक्षता के लिए मांग की जा रही है कि इस पूरे सिंडिकेट का पर्दाफाश करने के लिए हाईकोर्ट के जजों की कमेटी गठित हो, ताकि पुलिस और राजस्व विभाग की मिलीभगत की भी जांच हो सके।