नई दिल्ली: अगले महीने से आम लोगों को दवाओं के लिए थोड़ा अधिक खर्च करना पड़ सकता है। सरकार ने आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची (NLEM) में शामिल कई दवाओं की कीमतों में मामूली वृद्धि को मंजूरी दे दी है। यह नई दरें 1 अप्रैल 2026 से लागू होंगी और इससे करीब 1,000 से अधिक जरूरी दवाओं की कीमतों पर असर पड़ेगा।
दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने वाली संस्था नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) के मुताबिक, दामों में यह संशोधन थोक मूल्य सूचकांक (WPI) के आधार पर किया गया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार पिछले वर्ष थोक महंगाई में लगभग 0.65 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जिसके अनुरूप नियंत्रित दवाओं की कीमतों में भी सीमित बढ़ोतरी की अनुमति दी गई है।
आवश्यक दवाओं की सूची में बुखार, दर्द और संक्रमण से जुड़ी कई आम दवाएं शामिल हैं। इनमें पैरासिटामोल, विभिन्न एंटीबायोटिक्स, एनीमिया की दवाएं, विटामिन और खनिज सप्लीमेंट के साथ-साथ कुछ स्टेरॉयड और गंभीर संक्रमणों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाएं भी शामिल हैं। इन दवाओं की कीमतों में बदलाव साल में केवल एक बार ही किया जाता है।
फार्मा उद्योग के जानकारों का कहना है कि दवा निर्माण की लागत में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। खासकर सक्रिय फार्मास्युटिकल सामग्री (API) और अन्य रासायनिक घटकों के दाम में तेजी आई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमतों में उछाल के कारण दवा कंपनियों पर लागत का दबाव बढ़ा है।
उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले कुछ महीनों में कई आवश्यक कच्चे पदार्थों की कीमतों में 25 से 35 प्रतिशत तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसके अलावा दवाओं की पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाले पीवीसी और एल्युमीनियम फॉयल जैसे उत्पाद भी महंगे हो गए हैं, जिससे उत्पादन लागत पर असर पड़ा है।
फार्मा कंपनियों का मानना है कि मौजूदा बढ़ोतरी सीमित है और बढ़ती लागत के मुकाबले यह पर्याप्त नहीं है। उद्योग से जुड़े संगठन इस मुद्दे पर नियामक संस्थाओं के साथ आगे भी चर्चा कर सकते हैं, ताकि लागत और दाम के बीच संतुलन बनाया जा सके।