Bagnath Temple : उत्तराखंड के बागेश्वर में स्थित बाबा बागनाथ मंदिर अपनी अनोखी परंपराओं के लिए खास पहचान रखता है। सरयू, गोमती और सरस्वती नदियों के संगम पर बसे इस प्राचीन मंदिर में आस्था के साथ-साथ संवेदनशील धार्मिक रीति-रिवाज भी देखने को मिलते हैं, जो इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाते हैं।
यहां एक खास परंपरा श्मशान घाट से जुड़ी हुई है। मंदिर के पास स्थित श्मशान में जब भी किसी का अंतिम संस्कार होता है, उस दौरान भगवान शिव को चढ़ाया जाने वाला दाल-भात का भोग रोक दिया जाता है। मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार, यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है और इसे पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जाता है।
मान्यता है कि भगवान शिव को “श्मशानवासी” कहा जाता है, इसलिए जब आसपास किसी परिवार में शोक का माहौल होता है, तब मंदिर में भोजन का भोग अर्पित करना उचित नहीं माना जाता। यही कारण है कि अंतिम संस्कार के दौरान केवल पूजा और आरती होती है, लेकिन अन्न का प्रसाद नहीं चढ़ाया जाता।
यदि पूरे दिन श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार चलते रहें, तो दिनभर मंदिर में भोग नहीं लगाया जाता। हालांकि, धार्मिक परंपराओं का संतुलन बनाए रखने के लिए शाम या रात्रि के समय भगवान को मिठाई का भोग अर्पित किया जाता है, ताकि पूजा-विधि भी पूरी हो सके।
स्थानीय पुजारियों का कहना है कि यह परंपरा केवल आस्था ही नहीं, बल्कि समाज की संवेदनशीलता को भी दर्शाती है—जहां धर्म के साथ मानवीय भावनाओं का सम्मान भी किया जाता है।
यही वजह है कि बाबा बागनाथ मंदिर न केवल एक प्रमुख धार्मिक स्थल है, बल्कि अपनी विशिष्ट परंपराओं के कारण कुमाऊं क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा भी माना जाता है। यहां आने वाले श्रद्धालु इस परंपरा को जानकर आश्चर्यचकित होते हैं और उनकी आस्था और भी गहरी हो जाती है।