रायपुर : छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ लंबे अभियान के बाद अब राज्य सरकार ने आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को लेकर नई सख्त व्यवस्था लागू करने का फैसला किया है। सरकार अब यह सुनिश्चित करना चाहती है कि सरेंडर का दावा करने वाला हर व्यक्ति वास्तव में नक्सली गतिविधियों से जुड़ा रहा हो और वही पुनर्वास योजनाओं का लाभ उठाए।
इसके लिए आत्मसमर्पण करने वालों की पहचान और पृष्ठभूमि की जांच की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। नक्सल प्रभावित जिलों में पुलिस अधीक्षकों (SP) को इस पूरी प्रक्रिया की जिम्मेदारी दी गई है। वे प्रत्येक सरेंडर करने वाले व्यक्ति का विस्तृत रिकॉर्ड तैयार करेंगे, उसकी जानकारी जुटाएंगे और समय-समय पर उसे अपडेट भी करेंगे।
मार्च 2026 में राज्य को नक्सल मुक्त घोषित किए जाने के बाद यह कदम और अहम माना जा रहा है। इससे पहले राज्य में हजारों नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया था, जिनकी अब व्यवस्थित जांच कर पारदर्शिता सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है।
यह निर्णय केंद्र सरकार की गाइडलाइन के अनुरूप लिया गया है। गृह मंत्रालय द्वारा जारी आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति के तहत किसी भी नक्सली को जिला प्रशासन या अधिकृत अधिकारियों के सामने सरेंडर करने की अनुमति है। अब उसी नीति को और प्रभावी बनाने के लिए जिला स्तर पर सत्यापन को अनिवार्य किया जा रहा है।
नई व्यवस्था के तहत सरेंडर करने वालों के पुराने रिकॉर्ड की गहराई से जांच होगी। उनकी गतिविधियों, संगठन से जुड़ाव और दिए गए विवरण का मिलान संबंधित एजेंसियों से किया जाएगा। तय प्रारूप में सारी जानकारी दर्ज की जाएगी ताकि भविष्य में कोई गड़बड़ी न हो।
सरकार का स्पष्ट उद्देश्य फर्जी आत्मसमर्पण की घटनाओं पर रोक लगाना है। पहले कई बार ऐसे मामले सामने आए थे, जहां बिना नक्सली पृष्ठभूमि वाले लोगों ने योजनाओं का लाभ लेने की कोशिश की। अब सख्त जांच से ऐसे प्रयासों को रोका जा सकेगा।
पिछले तीन वर्षों में राज्य में नक्सलियों के आत्मसमर्पण में तेजी देखने को मिली है। हजारों की संख्या में नक्सलियों ने मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया, जिनमें बड़ी संख्या बस्तर क्षेत्र से रही। अलग-अलग स्तर के कैडर, कमांडर और इनामी नक्सली भी इसमें शामिल रहे हैं।
इन सरेंडर में महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही है, जो इस बदलाव की व्यापकता को दर्शाती है। कई बड़े इनामी नक्सलियों ने भी हथियार छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटने का रास्ता चुना।
कुल मिलाकर, सरकार का यह नया कदम न सिर्फ पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में है, बल्कि इससे पुनर्वास योजनाओं का लाभ सही लोगों तक पहुंचाने में भी मदद मिलेगी और नक्सलवाद के खिलाफ चल रही मुहिम को और मजबूती मिलेगी।