दुर्ग। जिला मुख्यालय में आज ग्रामीण पीड़ा की एक बेबस तस्वीर सामने आई, जहां दशकों से बसे परिवार आज भी अपने ही आशियाने पर कानूनी हक पाने के लिए तरस रहे हैं। दुर्ग जिले के ग्राम खपरी के दर्जनों ग्रामीणों ने आज जिला कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर एक ज्ञापन सौंपा और अपनी तीन पीढ़ियों पुराने आशियाने के लिए इंसाफ की गुहार लगाई।
राजस्व रिकॉर्ड में ‘घास भूमि’ बनी गले की फांस
ग्रामीणों के अनुसार, ग्राम खपरी में करीब 40 से 50 परिवार पिछले 80 से 90 वर्षों से मकान बनाकर निवास कर रहे हैं। उनके दादा-परदादा के जमाने से दो से तीन पीढ़ियां इसी जमीन पर पली-बढ़ी हैं। वर्षों पुराना रहवास होने के बावजूद राजस्व रिकॉर्ड में यह जमीन आज भी “घास भूमि” (चरनोई) के रूप में दर्ज है। तकनीकी पेंच के कारण ग्रामीणों को न तो अब तक आवासीय पट्टा मिल सका है और न ही स्वामित्व का कोई कानूनी अधिकार।

सम्मान और सुरक्षा की लड़ाई
कलेक्टर कार्यालय पहुंचे ग्रामीणों ने अपनी पीड़ा बयां करते हुए कहा कि बिना वैधानिक अधिकार के वे हमेशा बेदखली के डर के साए में जीने को मजबूर हैं। उन्होंने जिला प्रशासन से मांग की है कि इस घास भूमि को तत्काल ‘आबादी भूमि’ घोषित किया जाए, ताकि उन्हें मालिकाना हक का पट्टा मिल सके। ग्रामीणों का कहना है कि उनकी यह मांग सिर्फ जमीन के टुकड़े की नहीं, बल्कि उनके सम्मान और आने वाली पीढ़ी की सुरक्षा की है।
अब देखना होगा कि जिला प्रशासन पीढ़ियों से संघर्ष कर रहे इन 40 से 50 ग्रामीण परिवारों की इस गंभीर समस्या पर कब तक संज्ञान लेता है और उन्हें उनका वैधानिक अधिकार कब तक मिल पाता है।