डॉक्टर अनुराधा बक्शी “अनु” अधिवक्ता लोकतन्त्र प्रहरी के दैनिक पाठक द्वारा भेजे गए पत्र से..
भाग 1: पिंजरा क्या है?
कभी किसी ने सोचा है कि…शब्द.. कितने गंभीर और घातक हो गए हैं वक्त के साथ।
हम शब्दों को ढो रहे हैं, और थक गए हैं उन्हें ढोते-ढोते।
शब्दों का डर हमारे भीतर इस कदर भर दिया गया है कि उनके अर्थ को चरितार्थ करने की कोशिश में हम खुद टूट रहे हैं, बिखर रहे हैं। फिर भी हम उन्हें ओढ़े हुए हैं, पीढ़ी-दर-पीढ़ी।
हर पल कोई न कोई इनकी गिरफ्त में कैद होकर खत्म हो रहा है। खा रहे हैं ये इंसान को।
इनके बंधन में छटपटाकर इंसान खत्म हो जाता है, पर…शब्द अमर हो जाते हैं।
इंसान ने शब्दों को तो अमर कर दिया, पर उन्हें कभी जला नहीं पाया। इनकी जकड़न जानलेवा है।
भाग 2: हम कैसे फंसे?
शब्दों के जन्म के साथ इतिहास ने शब्दों को इतना बल दे दिया है कि आज जब कोई उनसे बाहर निकलना चाहता है, तो इनकी कूटरचित नीति में फंसकर खुद को ही गलत मान बैठता है।
इंसान जी नहीं रहा। खुद को खोकर शब्दों को जी रहा है…
क्या शब्द जीवन से बड़े हो गए हैं?
क्या वे साक्षी बन गए हैं हमारे चरित्र के, हमारी नियति के?
सोचती हूँ, जब इंसान ने बोलना शुरू नहीं किया होगा, या जब शब्द इंसान से छोटे होंगे तब जीवन कितना सरल रहा होगा।
न शब्दों को सही साबित करने का भार। न उनके अर्थों में उलझकर खुद को खो देने का डर।
तब इंसान ज्यादा इंसान रहा होगा। तब वो सिर्फ जीता होगा.. बस जीता होगा।
शब्द की शातिरता देखिए। खुद को अमर बनाने के लिए इंसान से लड़ता भी है और दूसरों को लड़ाता भी है। पर शब्दों पर कभी आंच नहीं आती।
इंसान ने शब्दों को पैदा किया और इंसान के पैदा होते ही शब्दों ने उसे कैद कर लिया: लड़का-सही-गलत, लड़की-सही-गलत, जाति-सही-गलत, धर्म-सही-गलत।
शब्दों का ये संसार तो संसार से भी ऊपर है।
कभी मकड़ी को जाल बुनते देखा है? कितनी शातिर होती है। अपने शिकार को फंसाने के लिए कितनी महीन बुनाई करती है।
शब्द अब मुझे वैसे ही लगते हैं। एक जाल, एक कैद।
भाग 3: आज़ाद कैसे हों?
शब्द कभी थकते नहीं। पर क्या अपने ब्रह्मांड में घूमते-घूमते इन्हें भी कभी थकान लगी होगी? कभी ये भी शर्मिंदा हुए होंगे?
तो फिर मेरा ‘मैं’ हो जाना ही सही होगा। शब्दों से मिली थकान उतारने और उनका बोझ कम करने के लिए।
मेरी क्रिया से ही तो इन्हें बल मिलता है। तो मेरी खामोशी से ही इन्हें शांति मिलेगी।
देखा है हमने, कभी खामोशी कितना कुछ बोल देती है और वहां शब्द अर्थहीन हो जाते हैं।
शब्द व्यर्थ नहीं हैं। पर ये सच है, अब हम सजग हो रहे हैं। इनकी कैद से बाहर आना चाहते हैं।
जब शब्द आए थे, तब इंसान ज्यादा इंसान था। अब शब्द बढ़ते जा रहे हैं, और इंसान घटता जा रहा है।
मैं शब्दों से पहले ‘मैं’ थी। अब मैं पिंजरे से छूटना चाहती हूं, क्योंकि शब्दों ने हमें बांट दिया है।
पति खत्म हो गया, पर ‘पति’ शब्द ज़िंदा है।
पत्नी जल गई, पर ‘पत्नी’ शब्द अमर है।
कब तक शब्दों को अमर करके इंसान को खत्म करते रहोगे?
ये लेख अधूरा है… क्योंकि मैं अभी पिंजरे से निकलने की कोशिश में हूं। जिस दिन निकल गई, उस दिन आखिरी शब्द खुद लिख दूंगी।
..तब तक आप बताइए… सुबह उठकर आप ‘इंसान’ होते हैं या ‘पति/पत्नी/वकील/बहु’?
डॉक्टर अनुराधा बक्शी ‘Anu’
अधिवक्ता, दुर्ग, छत्तीसगढ़