पूजा में दीपक की बाती ऐसे बनाएं, पूरी आरती तक जलती रहेगी ज्योति, भगवान प्रसन्न होकर देंगे मनचाहा आशीर्वाद!

धर्म डेस्क। सनातन परंपरा में पूजा-पाठ के दौरान दीपक जलाने का विशेष महत्व माना गया है। दीपक को सकारात्मक ऊर्जा, ज्ञान और शुभता का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि पूजा के समय प्रज्ज्वलित दीपक से वातावरण में सकारात्मकता का संचार होता है और देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है। हालांकि कई बार गलत तरीके से बनाई गई बाती के कारण दीपक ठीक से नहीं जल पाता या बीच में बुझ जाता है, जिसे धार्मिक दृष्टि से शुभ नहीं माना जाता।

दो प्रकार की होती हैं दीपक की बाती

धार्मिक परंपराओं के अनुसार दीपक की बाती मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है—गोल बाती और लंबी बाती। घी के दीपक में सामान्यतः गोल बाती का उपयोग किया जाता है, जबकि तेल के दीपक के लिए लंबी बाती उपयुक्त मानी जाती है।

घी के दीपक के लिए ऐसे बनाएं गोल बाती

घी के दीपक के लिए कच्चे सूत या शुद्ध कपास की रुई का उपयोग करना चाहिए। रुई को हथेली में लेकर गोल आकार दें और ऊपर की ओर एक नुकीली चोंच बना लें। इस चोंच पर थोड़ा कपूर पाउडर या कच्चा दूध लगाने से बाती की नोक बेहतर बनती है। इसके बाद बाती को शुद्ध गाय के घी में अच्छी तरह डुबो दें। इस प्रकार तैयार की गई बाती की लौ अधिक उज्ज्वल रहती है और लंबे समय तक जलती है।

तेल के दीपक के लिए लंबी बाती है बेहतर

तेल के दीपक के लिए लंबी बाती बनाई जाती है ताकि वह तेल में अच्छी तरह डूबी रहे और लगातार तेल खींचकर जलती रहे। इसके लिए रुई को लंबा आकार दें और दोनों सिरों को हल्का पतला एवं नुकीला कर लें। ध्यान रखें कि बाती को अत्यधिक कसकर न बनाएं, क्योंकि बहुत टाइट बाती में तेल ऊपर तक नहीं पहुंच पाता और दीपक जल्दी बुझ सकता है। जिस सिरे को जलाना हो, वहां थोड़ा कपूर पाउडर लगाने से दीपक आसानी से प्रज्ज्वलित हो जाता है।

दीपक जलाने से पहले रखें इन बातों का ध्यान

विशेषज्ञों के अनुसार मिट्टी के दीपक को उपयोग से पहले कुछ समय पानी में भिगोकर रखना लाभकारी माना जाता है। बाद में उसे सुखाकर उपयोग करने से दीपक अधिक समय तक सुरक्षित रहता है। वहीं बाती को पहले से तेल या घी में भिगो देने से वह पूरी तरह तैयार हो जाती है और दीपक की लौ अधिक स्थिर एवं उज्ज्वल रहती है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सही तरीके से तैयार की गई बाती और श्रद्धा से जलाया गया दीपक पूजा के वातावरण को अधिक पवित्र बनाता है तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।

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