भिलाई। सनातन धर्म में श्रावण मास भगवान शिव की आराधना का सर्वोत्तम काल माना गया है। इस पावन माह में “हर-हर महादेव” और “बोल बम” के जयघोष से संपूर्ण वातावरण शिवमय हो उठता है। इसी दिव्य आस्था और सनातन परंपरा का निर्वहन करते हुए भिलाई से श्रद्धालु कांवड़ियों का एक पावन जत्था बाबा बैद्यनाथ धाम (देवघर, झारखंड) की यात्रा के लिए श्रद्धा और उत्साह के साथ रवाना हुआ।
अमित पांडे तथा एस.आर. हॉस्पिटल कॉलेज एंड रिसर्च सेंटर एवं लोकतंत्र प्रहरी मीडिया ग्रुप के प्रधान संपादक डॉ. संजय तिवारी के नेतृत्व में रवाना हुए श्रद्धालु सर्वप्रथम कोलकाता स्थित जगत प्रसिद्ध मां काली के शक्तिपीठ में दर्शन-पूजन करेंगे। इसके पश्चात बिहार के सुल्तानगंज पहुंचकर उत्तरवाहिनी गंगा से पवित्र गंगाजल दो कलशों में भरेंगे और लगभग 105 किलोमीटर की कठिन पदयात्रा प्रारंभ करेंगे।
सनातन परंपरा के अनुसार कांवड़ यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि संयम, तप, त्याग, अनुशासन और अटूट शिवभक्ति का जीवंत प्रतीक है। श्रद्धालु नंगे पैर “बोल बम” के जयघोष के साथ कठिन यात्रा करते हुए बाबा बैद्यनाथ धाम पहुंचेंगे, जहां भगवान शिव का वैदिक विधि-विधान से जलाभिषेक एवं रुद्राभिषेक किया जाएगा।
इसके उपरांत दूसरे कलश में सुरक्षित रखे गए गंगाजल से झारखंड के दुमका स्थित बाबा वासुकीनाथ धाम में भगवान वासुकीनाथ का जलाभिषेक किया जाएगा। सनातन मान्यता है कि बाबा बैद्यनाथ और बाबा वासुकीनाथ दोनों धामों में गंगाजल अर्पित करने के पश्चात ही कांवड़ यात्रा पूर्ण मानी जाती है तथा साधक को भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
सनातन आस्था का दिव्य केंद्र है बाबा बैद्यनाथ धाम
झारखंड के देवघर में स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम को सनातन धर्म के अत्यंत पवित्र शिवधामों में स्थान प्राप्त है। मान्यता है कि यह भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है। श्रावण मास में देश-विदेश से लाखों शिवभक्त सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा से गंगाजल लेकर पैदल देवघर पहुंचते हैं और बाबा भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं। इस दौरान पूरा क्षेत्र “बोल बम” और “हर-हर महादेव” के उद्घोष से शिवमय हो जाता है।




रावण की तपस्या से जुड़ी है बैद्यनाथ धाम की महिमा
पौराणिक कथाओं के अनुसार लंकापति रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया और अपने दसों शीश अर्पित कर दिए। उनकी अद्भुत भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पुनः जीवन प्रदान किया और “वैद्य” स्वरूप में उनके घावों का उपचार किया। इसी कारण इस पवित्र स्थान का नाम “बैद्यनाथ” पड़ा।
मान्यता है कि भगवान शिव ने रावण को शिवलिंग प्रदान करते हुए उसे कहीं भी भूमि पर न रखने का निर्देश दिया था। देवताओं की लीला से मार्ग में रावण को रुकना पड़ा और उन्होंने शिवलिंग एक ग्वाले के हाथों सौंप दिया। ग्वाले ने शिवलिंग भूमि पर रख दिया, जहां वह स्थायी रूप से स्थापित हो गया। यही दिव्य शिवलिंग आज बाबा बैद्यनाथ के रूप में पूजित है।
बाबा वासुकीनाथ: जहां पूर्ण होती है कांवड़ यात्रा
दुमका जिले में स्थित बाबा वासुकीनाथ धाम भी भगवान शिव का अत्यंत प्राचीन एवं सिद्ध तीर्थ माना जाता है। सनातन परंपरा के अनुसार बाबा बैद्यनाथ के दर्शन और जलाभिषेक के बाद बाबा वासुकीनाथ का अभिषेक करने से ही कांवड़ यात्रा पूर्ण होती है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यहां भगवान शिव एवं माता पार्वती संयुक्त रूप से भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं तथा सच्चे मन से की गई प्रार्थना अवश्य स्वीकार होती है।
शिवभक्ति से ओतप्रोत रहेगा पूरा सफर
भिलाई से रवाना हुए 15 श्रद्धालुओं का यह जत्था मां काली के दर्शन, सुल्तानगंज से उत्तरवाहिनी गंगा का पवित्र जल संग्रह, बाबा बैद्यनाथ धाम में जलाभिषेक तथा अंत में बाबा वासुकीनाथ धाम में पूजा-अर्चना कर अपनी आध्यात्मिक यात्रा पूर्ण करेगा। पूरे मार्ग में श्रद्धालु “बोल बम”, “हर-हर महादेव” और “ॐ नमः शिवाय” के जयघोष के साथ शिवभक्ति में लीन रहेंगे।
इस पावन यात्रा में अमित पांडे, डॉ. संजय तिवारी, आकाश जायसवाल, रमाशंकर, विशाल जायसवाल, राहुल गुप्ता, राजेश सोनकर, वेदांत तिवारी, कौशल सोनकर, प्रदीप सोनकर, प्रदीप फौजी, कारण सोनकर, गणेश देवांगन, बब्बू सोनकर एवं गणेश साहू शामिल हैं।
“श्रद्धा, सेवा, संयम और शिवभक्ति का यह पावन संगम ही सनातन धर्म की जीवंत पहचान है। श्रावण मास में निकली कांवड़ यात्रा केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, तप और भगवान शिव के प्रति अटूट समर्पण का महापर्व है।”