नई दिल्ली। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की ओर से आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनेमिक्स’ में पर्यावरण और जलवायु न्याय से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा हो रही है। 19 और 20 सितंबर को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित इस सम्मेलन में भारत और विदेशों से न्यायविद, पर्यावरण विशेषज्ञ, नीति निर्माता और अन्य प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं।
सम्मेलन का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। अपने संबोधन में उन्होंने पर्यावरण संरक्षण और जलवायु न्याय के लिए वैश्विक स्तर पर सामूहिक प्रयासों की जरूरत बताई। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की परंपराओं में प्रकृति के साथ संतुलन और संरक्षण को विशेष महत्व दिया गया है। उन्होंने कहा कि भारत अपने अनुभवों के आधार पर आधुनिक जलवायु चुनौतियों के समाधान में योगदान दे रहा है।
विकासशील देशों पर पूरी जिम्मेदारी डालना उचित नहीं
प्रधानमंत्री मोदी ने जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर विकासशील देशों की जिम्मेदारी को लेकर भी बात रखी। उन्होंने कहा कि कार्बन उत्सर्जन का पूरा बोझ विकासशील देशों पर डालना उचित नहीं है। प्रधानमंत्री के अनुसार, भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन वैश्विक औसत के आधे से भी कम है, जबकि विकसित देशों का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन भारत की तुलना में कई गुना अधिक है। इस बयान की रिपोर्ट IANS ने भी की है।
उन्होंने भारत की जलवायु पहलों का उल्लेख करते हुए सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहनों, रेलवे विद्युतीकरण, मेट्रो, जल संरक्षण और पीएम सूर्य घर योजना जैसी पहलों को रेखांकित किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि देश में विकास के साथ पर्यावरणीय स्थिरता पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन जरूरी
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने पर्यावरण संरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 48ए राज्य को पर्यावरण की रक्षा और सुधार का दायित्व देता है, जबकि अनुच्छेद 51ए नागरिकों को प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा के लिए प्रेरित करता है।
उन्होंने पर्यावरण न्याय से जुड़े न्यायिक सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि अब बड़ी चुनौती विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन कायम करने की है।
आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण संरक्षण पर जोर
NGT के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव ने कहा कि पर्यावरण से जुड़ी चर्चा केवल वर्तमान समस्याओं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और टिकाऊ पृथ्वी सुनिश्चित करना भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है।
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने भी प्रभावी वैश्विक नियमों और संस्थागत व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि पर्यावरणीय समस्याओं से निपटने के लिए केवल संधियां और घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं। पर्यावरणीय क्षति की रोकथाम के साथ उसके प्रभावी उपचार के लिए मजबूत वैश्विक व्यवस्था की जरूरत है।
NGT के आधिकारिक कार्यक्रम के अनुसार सम्मेलन में जलवायु न्याय, समानता, पर्यावरण कानून, वैश्विक सहयोग, जैव विविधता और टिकाऊ ऊर्जा जैसे विषयों पर भी सत्र आयोजित किए जा रहे हैं।