नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) को लेकर देश की सियासत एक बार फिर गरमा गई है। विपक्ष जहां एसआईआर की प्रक्रिया और चुनाव आयोग की भूमिका पर लगातार सवाल उठा रहा है, वहीं उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर 13 करोड़ से अधिक नामों को लेकर किए जा रहे दावों पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
दरअसल, जून 2025 से मई 2026 के बीच एसआईआर से जुड़ी विभिन्न प्रक्रियाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। कोर्ट ने प्रक्रिया को पूरी तरह खारिज करने के बजाय इसे वैध माना और कहा कि निष्पक्ष चुनाव के लिए यह तय करना जरूरी है कि मतदाता सूची में किन लोगों के नाम होने चाहिए।
13.3 करोड़ के आंकड़े पर क्या है तस्वीर?
एसआईआर के दौरान करीब 13.3 करोड़ मतदाताओं से जुड़े मामलों का जिक्र किया गया। हालांकि, इन सभी मामलों को एक समान संदिग्ध या विवादित मानना सही नहीं है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार करीब 2.8 करोड़ लोगों की पिछले दो दशकों में मृत्यु हो चुकी है। वहीं, एक करोड़ से अधिक नाम ऐसे बताए गए जो एक से ज्यादा स्थानों पर दर्ज थे।
इसके अलावा करीब 6.5 करोड़ लोग स्थायी रूप से दूसरे स्थानों पर स्थानांतरित हो चुके हैं, यानी वे अपने पुराने दर्ज पते पर अब नहीं रह रहे हैं। चुनाव आयोग के अनुसार करीब 3 करोड़ लोग एसआईआर के दौरान अपने दर्ज पते पर मौजूद नहीं मिले। वहीं, कई ऐसे मतदाता भी हैं जिन्हें दस्तावेज उपलब्ध कराने में असमर्थता के कारण नोटिस जारी किया गया।
इन आंकड़ों के आधार पर दावा किया जा रहा है कि 13 करोड़ से अधिक मामलों में से वास्तविक तौर पर करीब 25 प्रतिशत मामले ही ऐसे हैं जिन पर आगे जांच या दस्तावेजी प्रक्रिया की जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
एसआईआर को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बिहार से शुरू हुई कानूनी लड़ाई 24 जून 2025 को चुनाव आयोग की अधिसूचना के बाद शुरू हुई थी। विभिन्न याचिकाओं में एसआईआर को असंवैधानिक बताते हुए चुनौती दी गई थी।
लंबी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रिया पर रोक नहीं लगाई, हालांकि पारदर्शिता और आम मतदाताओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए कुछ प्रक्रियात्मक निर्देश जरूर दिए।
27 मई के फैसले में कोर्ट ने एसआईआर को निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के संवैधानिक दायित्व से जोड़ते हुए कई महत्वपूर्ण सवालों पर विचार किया। इनमें चुनाव आयोग के एसआईआर कराने के अधिकार, प्रक्रिया की वैधता, संबंधित कानूनों के प्रावधानों और मतदाता सूची में नाम शामिल करने के लिए नागरिकता की सीमित जांच का अधिकार शामिल था।
कोर्ट ने माना कि चुनाव आयोग को एसआईआर कराने का अधिकार है और मतदाता सूची में नाम शामिल करने के संदर्भ में आयोग नागरिकता की सीमित जांच कर सकता है।
विवाद अभी भी जारी
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद एसआईआर को लेकर राजनीतिक विवाद खत्म नहीं हुआ है। विपक्ष लगातार चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा है और बड़ी संख्या में नामों को लेकर चिंता जाहिर कर रहा है।
वहीं, चुनाव आयोग ने कहा है कि करीब 20 राज्यों में उन मतदाताओं की दोबारा जांच की जाएगी जिन्हें नोटिस दिया गया है या जिनके नाम अंतिम सूची से बाहर किए गए हैं।
ऐसे में अब बहस सिर्फ एसआईआर की वैधानिकता तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है कि 13 करोड़ से अधिक मामलों में वास्तव में कितने मतदाता ऐसे हैं जिनकी पात्रता पर गंभीर सवाल बाकी हैं और कितने मामले मृत्यु, स्थानांतरण या डुप्लीकेट प्रविष्टियों से जुड़े हैं।