नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण का लाभ लेने से जुड़े मामले में तमिलनाडु सरकार को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल धर्म परिवर्तन करने से किसी व्यक्ति को पिछड़े मुस्लिम वर्ग के तहत आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता। इसके लिए संबंधित वर्ग में शामिल होने की निर्धारित शर्तों को पूरा करना जरूरी है।
मद्रास हाई कोर्ट का फैसला बरकरार
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति चंद्रशेखर की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए मद्रास हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। हाई कोर्ट ने पहले तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसके तहत दूसरे धर्म से इस्लाम अपनाने वाले कुछ लोगों को पिछड़े मुस्लिम वर्ग के प्रमाणपत्र देकर आरक्षण का लाभ देने की व्यवस्था की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्य सरकार की दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत के फैसले के अनुसार, केवल इस्लाम धर्म अपनाने से कोई व्यक्ति अपने आप पिछड़े मुस्लिम वर्ग में शामिल नहीं हो जाता।
मार्च 2024 में जारी हुआ था आदेश
दरअसल, तमिलनाडु सरकार ने मार्च 2024 में एक आदेश जारी किया था। इसमें पिछड़े वर्ग, अति पिछड़े वर्ग, कुछ अधिसूचित समुदायों और अनुसूचित जाति से इस्लाम अपनाने वाले लोगों को पिछड़े मुस्लिम वर्ग के तहत प्रमाणपत्र देने की व्यवस्था की गई थी।
इस आदेश को मद्रास हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी। हाई कोर्ट ने इसे रद्द करते हुए कहा था कि केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर पिछड़े मुस्लिम वर्ग में आरक्षण का दावा नहीं किया जा सकता।
सरकार की दलील सुप्रीम कोर्ट ने नहीं मानी
तमिलनाडु सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। राज्य सरकार का तर्क था कि यह नीति विशेषज्ञ वैधानिक आयोग की सिफारिशों के आधार पर बनाई गई थी और इसमें हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी और हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। इस फैसले से स्पष्ट होता है कि आरक्षण का लाभ लेने के लिए संबंधित संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के तहत पात्रता जरूरी है।