बिजली की बढ़ती मांग ने बढ़ाई चिंता, देश के 96 पावर प्लांट में कोयले का भंडार कम

नई दिल्ली। देश में बिजली की बढ़ती मांग और जलविद्युत उत्पादन में गिरावट के बीच कोयले के भंडार पर दबाव बढ़ने लगा है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के आंकड़ों के मुताबिक, 19 अक्टूबर 2026 तक देश के 191 कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में से 96 में कोयले का स्टॉक गंभीर रूप से कम हो गया था। इन संयंत्रों के पास तीन दिन से भी कम समय तक बिजली उत्पादन करने लायक कोयला बचा है। बढ़ती खपत और असामान्य रूप से गर्म मौसम के बीच इस स्थिति ने बिजली आपूर्ति व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

एक महीने में 60 से बढ़कर 96 हुए संयंत्र

CEA के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर के मध्य में ऐसे बिजली संयंत्रों की संख्या 60 थी, जहां कोयले का भंडार गंभीर रूप से कम था। 19 अक्टूबर तक यह संख्या बढ़कर 96 हो गई। यानी करीब एक महीने में 36 और संयंत्र इस स्थिति में पहुंच गए।

अक्टूबर की शुरुआत से बिजली संयंत्रों में कुल कोयला स्टॉक में भी लगभग 5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यह स्थिति ऐसे समय सामने आई है, जब कोयला मंत्रालय ने पिछले सप्ताह बिजली संयंत्रों को कोयले की आपूर्ति बढ़ाने की जानकारी दी थी।

पिछले साल से 45 से 50 गीगावाट अधिक रही बिजली की मांग

देश में बिजली की खपत बढ़ने के पीछे गर्म मौसम को भी एक प्रमुख कारण माना जा रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, इस वर्ष दैनिक अधिकतम बिजली मांग पिछले साल की तुलना में लगभग 45 से 50 गीगावाट अधिक रही है।

वहीं, कमजोर मानसूनी बारिश के कारण जलविद्युत उत्पादन प्रभावित हुआ है। ऐसे में बिजली की मांग पूरी करने के लिए कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों पर निर्भरता बढ़ गई है। सामान्य तौर पर जलविद्युत संयंत्र बिजली आपूर्ति में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, लेकिन उत्पादन घटने पर ताप विद्युत संयंत्रों को अधिक बिजली पैदा करनी पड़ती है।

सितंबर में बिजली उत्पादन के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता

CEA के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर 2026 में बिजली की मांग और उपलब्ध आपूर्ति के बीच अंतर बढ़कर 560 मिलियन यूनिट (एमयू), यानी 56 करोड़ यूनिट हो गया। इसे अगस्त 2023 के बाद सबसे बड़ा अंतर बताया गया है।

इसी दौरान कोयला आधारित बिजली उत्पादन में पिछले साल के सितंबर महीने की तुलना में 13.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि जलविद्युत उत्पादन में 20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।

ये आंकड़े बताते हैं कि जलविद्युत उत्पादन में कमी के बीच देश की बिजली जरूरतें पूरी करने के लिए ताप विद्युत संयंत्रों पर दबाव बढ़ा है।

नवीकरणीय ऊर्जा बढ़ने के बावजूद कोयले की अहम भूमिका

भारत में सौर और पवन ऊर्जा सहित गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों की क्षमता लगातार बढ़ रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, देश की कुल बिजली उत्पादन क्षमता में गैर-जीवाश्म स्रोतों की हिस्सेदारी करीब 55 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है।

हालांकि, सौर और पवन ऊर्जा का उत्पादन मौसम और प्राकृतिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। बड़े पैमाने पर बिजली को बैटरी के जरिए संग्रहित करने की सीमाएं भी बनी हुई हैं। ऐसे में जब बिजली की मांग बढ़ती है या नवीकरणीय स्रोतों से उत्पादन कम होता है, तब कोयला आधारित बिजली संयंत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

कोयले की आपूर्ति पर रहेगी नजर

बिजली संयंत्रों में तीन दिन से कम का कोयला स्टॉक होने का मतलब यह नहीं है कि वहां बिजली उत्पादन बंद हो गया है। हालांकि, कम भंडार के कारण समय पर कोयले की आपूर्ति सुनिश्चित करना जरूरी हो जाता है।

यदि बिजली की मांग लगातार ऊंची बनी रहती है और कोयले की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो संबंधित संयंत्रों के उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में खदानों से कोयले की उपलब्धता, परिवहन व्यवस्था, बिजली संयंत्रों के भंडार और आने वाले दिनों की मांग पर लगातार निगरानी रखना आवश्यक होगा।

फिलहाल उपलब्ध आंकड़े बिजली क्षेत्र के सामने दोहरी चुनौती दिखाते हैं। एक ओर बिजली की मांग बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर जलविद्युत उत्पादन में गिरावट और कई ताप विद्युत संयंत्रों में सीमित कोयला भंडार चिंता का विषय बना हुआ है। आने वाले दिनों में कोयले की आपूर्ति और मौसम की स्थिति बिजली व्यवस्था पर पड़ने वाले दबाव को निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाएगी।

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