‘प्रदर्शन का अधिकार सबको है, लेकिन…’, सुप्रीम कोर्ट ने किस बात पर जताई चिंता?

नई दिल्ली। सार्वजनिक स्थानों पर लंबे समय तक धरना-प्रदर्शन जारी रखने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि किसी भी संगठन को किसी सार्वजनिक स्थल पर अनिश्चितकाल तक अपना कब्जा बनाए रखने की छूट नहीं दी जा सकती। प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थानों पर भी समय-सीमा तय होनी चाहिए, ताकि दूसरे संगठनों और आम नागरिकों को अपनी बात रखने का समान अवसर मिल सके।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन जजों की पीठ ने मंगलवार को यह टिप्पणी की। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। अदालत दिल्ली में अक्टूबर के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हुए प्रदर्शनों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इन याचिकाओं में पुलिस की कार्रवाई, प्रदर्शनकारियों को हटाने, निगरानी व्यवस्था और कारोबार पर पड़े असर जैसे मुद्दे उठाए गए हैं।

एक ही संगठन को लगातार जगह देने पर उठाए सवाल

सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि सार्वजनिक स्थान किसी एक संगठन के लिए स्थायी रूप से आरक्षित नहीं किए जा सकते। उन्होंने सवाल किया कि यदि कोई समूह लगातार एक ही जगह पर प्रदर्शन करता रहेगा, तो किसान, मजदूर, पत्रकार और अन्य संगठन अपनी मांगें रखने के लिए कहां जाएंगे?

पीठ ने कहा कि विरोध दर्ज कराना प्रत्येक नागरिक और संगठन का अधिकार है। लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल इस तरह होना चाहिए कि दूसरे लोगों को भी अपनी बात रखने का अवसर मिल सके। इसी उद्देश्य से प्रदर्शन स्थलों पर समय की सीमा निर्धारित करना जरूरी है।

व्यापारियों ने 2,000 करोड़ रुपये के नुकसान का दावा किया

सुनवाई में दिल्ली के व्यापारिक संगठनों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने बाजारों पर प्रदर्शन के प्रभाव का मुद्दा उठाया। उन्होंने बताया कि त्योहारों के महत्वपूर्ण कारोबारी समय में कई दुकानें बंद रहीं और व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित हुईं।

रोहतगी के अनुसार, प्रदर्शनों के चलते व्यापारियों को करीब 2,000 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि अगले दो महीनों तक दिल्ली में धरना-प्रदर्शन पर रोक लगाने पर विचार किया जाए। उनका कहना था कि कारोबार प्रभावित होने का असर दुकानदारों के अलावा वहां काम करने वाले कर्मचारियों और अन्य संबंधित लोगों पर भी पड़ता है।

एक दिन की मंजूरी के बाद 17 दिन तक जारी रहा प्रदर्शन

दिल्ली पुलिस की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए एक दिन की अनुमति दी गई थी, लेकिन प्रदर्शन 17 दिनों तक चलता रहा।

उन्होंने यह भी कहा कि प्रदर्शनकारियों ने अनुमति के बिना संसद की ओर मार्च किया। मेहता ने दलील दी कि संसद देश की संप्रभुता का प्रतीक है और बिना अनुमति ऐसे संवेदनशील स्थानों की ओर मार्च करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। उन्होंने यह भी कहा कि बंद या प्रदर्शन का आह्वान करने वाले संगठनों को उससे उत्पन्न परिस्थितियों की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।

करीब 7 हजार लोगों को हटाने की कार्रवाई पर सवाल

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने प्रदर्शन के दौरान लगभग 7,000 लोगों को हिरासत में लिए जाने का मुद्दा उठाया। उन्होंने सवाल किया कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों के खिलाफ कार्रवाई किए जाने से उनके लोकतांत्रिक अधिकार प्रभावित नहीं होते?

इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि संबंधित लोगों को हिरासत में नहीं लिया गया था, बल्कि प्रदर्शन स्थल से हटाया गया था।

प्रदर्शनकारियों की निगरानी को लेकर भी बहस

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने प्रदर्शन में शामिल लोगों की निगरानी पर सवाल उठाते हुए पूछा कि इसके लिए किस कानूनी प्रावधान का सहारा लिया गया था। उन्होंने निगरानी की वैधानिक प्रक्रिया स्पष्ट करने की मांग की।

जवाब में तुषार मेहता ने कहा कि निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरों का इस्तेमाल किया गया था। उन्होंने यह भी दलील दी कि प्रदर्शन के दौरान कई सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर खुद लाइव रिकॉर्डिंग कर रहे थे, ऐसे में सरकारी सीसीटीवी निगरानी पर आपत्ति का आधार स्पष्ट होना चाहिए।

अलग-अलग पक्षों ने रखीं अपनी दलीलें

मामले की सुनवाई में कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने विभिन्न पक्षों की ओर से अदालत के सामने अपनी बात रखी। मेनका गुरुस्वामी ने पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों को हटाए जाने का मुद्दा उठाया। मुकुल रोहतगी, संजय पोद्दार और सचिन पुरी ने व्यापारियों को हुए नुकसान का पक्ष रखा।

वहीं प्रशांत भूषण ने निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठाए, जबकि गोपाल शंकरनारायणन ने प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई से जुड़ी याचिकाओं पर दलीलें दीं। इंदिरा जयसिंह ने नेटवर्क ऑफ विमेन इन इंडिया की ओर से पक्ष रखा।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों में सार्वजनिक स्थानों पर विरोध-प्रदर्शन के अधिकार के साथ-साथ अन्य नागरिकों, संगठनों और कारोबारियों के हितों का ध्यान रखने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। अदालत के समक्ष मुख्य मुद्दा यही रहा कि लोकतांत्रिक विरोध का अधिकार सुरक्षित रहे, लेकिन सार्वजनिक स्थलों का इस्तेमाल दूसरों के अधिकारों और सामान्य जनजीवन को प्रभावित किए बिना हो।

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