दुर्ग। देश भर में एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) की स्थापना के 50 वर्ष पूरे होने पर महिला एवं बाल विकास विभाग ‘गोल्डन जुबली’ (स्वर्ण जयंती) मना रहा है। एक तरफ जहां सरकार इसे ‘अमृत काल’ कह रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर सरकारी योजनाओं को घर-घर पहुंचाने वाली आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही हैं।
मानदेय नहीं, यह मजाक है
आंगनबाड़ी संघ की बहनों का कहना है कि वे 50 वर्षों से विभाग की रीढ़ बनी हुई हैं। कोविड महामारी के दौरान जान जोखिम में डालना हो, निर्वाचन कार्य हो या स्वास्थ्य सर्वे, हर मोर्चे पर वे डटी रहीं। इसके बावजूद केंद्र सरकार द्वारा कार्यकर्ताओं को मात्र ₹4500 और सहायिकाओं को ₹2250 प्रति माह मानदेय दिया जा रहा है। महंगाई के इस दौर में इसे ‘जीने लायक वेतन’ कहना भी मुश्किल है। कार्यकर्ताओं ने इसे श्रम नियमों का खुला उल्लंघन बताया है।
सरकार की अनदेखी से आक्रोश
प्रदर्शनकारी बहनों ने बताया कि केंद्र सरकार ने साल 2018 के बाद से मानदेय में एक रुपये की भी वृद्धि नहीं की है। वहीं, छत्तीसगढ़ की वर्तमान सरकार पर भी वादाखिलाफी का आरोप लगा है। पिछले दो वर्षों में राज्य सरकार की ओर से न तो मानदेय बढ़ाया गया और न ही किसी अन्य सुविधा की घोषणा की गई।

- बुढ़ापे और बीमारी का कोई सहारा नहीं
- ज्ञापन के माध्यम से कार्यकर्ताओं ने अपनी प्रमुख मांगें रखी हैं, जिनमें शामिल हैं:
- शासकीयकरण: विभाग में नियमित कर्मचारी का दर्जा दिया जाए।
- सामाजिक सुरक्षा: बुढ़ापे के सहारे के लिए मासिक पेंशन और एकमुश्त ग्रेच्युटी राशि का प्रावधान।
- स्वास्थ्य सुरक्षा: गंभीर बीमारी की स्थिति में कैशलेस चिकित्सा सुविधा और समूह बीमा।
अवकाश की सुविधा: पारिवारिक दायित्वों और बच्चों के विवाह हेतु पर्याप्त सवैतनिक अवकाश (वर्तमान में मानदेय कटवाना पड़ता है)।
आंगनबाड़ी बहनों का कहना है कि जब हम विभाग का ‘गोल्डन जुबली’ वर्ष मना रहे हैं, तो सरकार को हमारे भविष्य को भी सुनहरा बनाना चाहिए। यदि मांगें पूरी नहीं हुईं, तो आने वाले समय में आंदोलन को और उग्र किया जाएगा।