नई दिल्ली: भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने मंगलवार को 32 देशों के सेना प्रमुखों और वरिष्ठ सैन्य कमांडरों के समक्ष अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने खासतौर पर अपने युवा दिनों की सोमालिया पोस्टिंग का ज़िक्र किया, जब वर्ष 1993-94 में वे मेजर के रूप में तैनात थे। इस दौरान उन्होंने बांग्लादेश, फ्रांस, इटली, मलेशिया, मोरक्को, नेपाल, नाइजीरिया और युगांडा के सैनिकों के साथ मिलकर संयुक्त रूप से शांति स्थापना में योगदान दिया।
जनरल द्विवेदी ने कहा, “विभिन्न देशों, संस्कृतियों और भाषाओं के सैनिक जब एक ही शांति के झंडे के तहत काम करते हैं, तो यह मानवता की अद्भुत एकजुटता का प्रतीक बन जाता है। 1948 से आज तक संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशन लाखों लोगों के लिए आशा की किरण साबित हुए हैं।”
सम्मेलन में उन्होंने भारत की वैश्विक शांति के प्रति प्रतिबद्धता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि शांति बनाए रखना कोई आम कार्य नहीं, बल्कि इसे केवल सैनिक ही कर सकता है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव डैग हैमरशोल्ड के कथन को उद्धृत करते हुए कहा कि यही भावना आज भी शांति अभियानों की आत्मा है।
जनरल द्विवेदी ने शांति अभियानों में नवाचार, समावेशिता और देशों के बीच सहयोग (Interoperability) की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने भारत की ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल का उल्लेख करते हुए कहा कि यह रक्षा क्षेत्र में व्यवहारिक और विस्तार योग्य समाधान प्रस्तुत करती है, जो वैश्विक साझेदारों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकते हैं।
इस अवसर पर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह, संयुक्त राष्ट्र के अवर महासचिव जीन पियरे लैक्रोआ, भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पर्वथनेनी हरीश और अन्य वरिष्ठ सैन्य अधिकारी उपस्थित थे।
32 देशों के इस कॉन्क्लेव में शामिल देश हैं – अल्जीरिया, आर्मेनिया, ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश, भूटान, ब्राजील, बुरुंडी, कंबोडिया, मिस्र, इथियोपिया, फिजी, फ्रांस, घाना, इटली, कजाखस्तान, केन्या, किर्गिस्तान, मेडागास्कर, मलेशिया, मंगोलिया, मोरक्को, नेपाल, नाइजीरिया, पोलैंड, रवांडा, श्रीलंका, सेनेगल, तंज़ानिया, थाईलैंड, युगांडा, उरुग्वे और वियतनाम।
कॉन्क्लेव के दौरान विभिन्न देशों के बीच सहयोग और तकनीकी आदान-प्रदान को बढ़ावा देने के लिए एक रक्षा प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में भाग लेने वाले देशों की सामूहिक क्षमता को सुदृढ़ करना है।