भारत में डिजिटल भुगतान की तस्वीर बदलने वाला UPI आज एक नई बहस के केंद्र में आ गया है। जहां एक ओर इसके जरिए लेन-देन लगातार नए रिकॉर्ड बना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इसे चलाने वाली फिनटेक कंपनियों की आर्थिक चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। कंपनियों का कहना है कि बिना स्थायी कमाई मॉडल के UPI जैसे बड़े सिस्टम को लंबे समय तक संभालना मुश्किल होता जा रहा है।
बीते कुछ वर्षों में UPI आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। सब्जी मंडी से लेकर बड़े शॉपिंग मॉल तक, हर जगह QR कोड के जरिए भुगतान सामान्य हो गया है। लेकिन इस “फ्री” सुविधा के पीछे भारी तकनीकी खर्च छिपा है। फिनटेक कंपनियों को सर्वर, साइबर सुरक्षा, फ्रॉड रोकथाम, कस्टमर सपोर्ट और नए व्यापारियों को जोड़ने पर लगातार हजारों करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं।
PhonePe जैसी कंपनियों का कहना है कि पहले सरकार से मिलने वाला इंसेंटिव इस बोझ को कुछ हद तक संभाल लेता था, लेकिन अब वह तेजी से घट रहा है। जहां पहले हजारों करोड़ की सहायता मिलती थी, वहीं मौजूदा बजट में यह राशि काफी सीमित रह गई है। ऐसे में कंपनियों के लिए केवल इंसेंटिव के भरोसे काम करना मुश्किल होता जा रहा है।
इस मुद्दे पर रिजर्व बैंक भी संकेत दे चुका है कि UPI से देश को बड़ा फायदा हुआ है, लेकिन इसकी लागत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। Payments Council of India ने भी चेताया है कि मौजूदा व्यवस्था लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है और अगर समाधान नहीं निकला, तो खासकर छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।
दिलचस्प यह है कि चुनौतियों के बावजूद UPI का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। देश में होने वाले अधिकांश डिजिटल भुगतान इसी प्लेटफॉर्म से हो रहे हैं और टियर-2 व टियर-3 शहरों में भी इसकी पहुंच तेजी से फैल रही है। इसी बढ़ते दबाव को देखते हुए फिनटेक कंपनियां सरकार से दो विकल्पों पर विचार करने की मांग कर रही हैं—या तो सब्सिडी में बढ़ोतरी हो, या फिर बड़े व्यापारियों पर सीमित MDR लागू करने की अनुमति दी जाए।
कंपनियों का मानना है कि अगर बड़े कारोबारियों से मामूली शुल्क लिया जाए और आम उपभोक्ताओं के लिए UPI मुफ्त रखा जाए, तो सिस्टम पर अतिरिक्त बोझ भी नहीं पड़ेगा और इकोसिस्टम को जरूरी फंड भी मिल सकेगा। बजट 2026 से पहले यह बहस और तेज होने की संभावना है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या UPI भविष्य में भी पूरी तरह मुफ्त रह पाएगा, या फिर डिजिटल भुगतान को टिकाऊ बनाने के लिए नया रास्ता अपनाना पड़ेगा?