First Name of Krishna : भगवान श्रीकृष्ण को केवल एक नाम से नहीं पहचाना जा सकता। वे उपदेशों के माध्यम से अर्जुन के सारथी हैं, तो वृंदावन में माखन चोर और द्वारका में राजाधिराज। विष्णु के आठवें अवतार के रूप में पूजे जाने वाले श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़े हर प्रसंग में कोई न कोई रहस्य छिपा है। इन्हीं रहस्यों में एक सवाल सदियों से लोगों की जिज्ञासा बना हुआ है—आखिर श्रीकृष्ण का सबसे पहला नाम क्या था?
कारागार में जन्म, विश्वास के बीच आया अवतार
पुराणों के अनुसार, श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा की कारागार में हुआ था। कंस को यह भविष्यवाणी भयभीत कर रही थी कि देवकी का आठवां पुत्र उसका अंत करेगा। इसी डर से उसने देवकी और वासुदेव को बंदी बना रखा था। जब भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि की रात बालक ने जन्म लिया, तो प्रकृति स्वयं इस घटना की साक्षी बनी—ताले खुले, पहरेदार मूर्छित हुए और रास्ते स्वयं बनते चले गए।

जन्म के साथ मिला पहला नाम
धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार, जन्म के समय माता-पिता ने अपने पुत्र का नाम कृष्ण ही रखा। यह नाम उनके श्यामल वर्ण और रहस्यमयी आभा का प्रतीक माना जाता है। संस्कृत में ‘कृष्ण’ का अर्थ गहराई, आकर्षण और दिव्यता से जुड़ा है, जो उनके व्यक्तित्व को पूरी तरह दर्शाता है।
गोकुल में बदली पहचान, लेकिन नाम वही रहा
वासुदेव बालक को गोकुल लेकर पहुंचे, जहां नंद और यशोदा के आंगन में उनका पालन-पोषण हुआ। वहां उन्हें प्रेम से कई नामों से पुकारा गया—कभी गोविंद, कभी श्याम, तो कभी मुरारी। ये नाम उनके कर्मों, लीलाओं और स्वभाव से जुड़े थे, न कि जन्म से। ग्वाल-बालों के संग खेलते, गायों की रक्षा करते और गोपियों के बीच रास रचाते हुए ये नाम प्रचलित होते चले गए।

नाम से आगे एक भाव बना ‘कृष्ण’
समय के साथ ‘कृष्ण’ केवल एक नाम नहीं, बल्कि भक्ति, प्रेम और धर्म का पर्याय बन गया। भक्तों के लिए यह नाम स्मरण, जप और साधना का माध्यम है। माना जाता है कि कृष्ण नाम का उच्चारण मात्र से मन को शांति और आत्मा को ऊर्जा मिलती है।
एक नाम, अनगिनत रूप
श्रीकृष्ण को जीवन के हर चरण में अलग-अलग नामों से जाना गया, लेकिन उनका मूल और प्रथम नाम ‘कृष्ण’ ही रहा। यही नाम उनके जन्म की दिव्यता, लीलाओं की गहराई और संदेशों की व्यापकता को दर्शाता है। आज भी जब भक्त ‘कृष्ण’ का नाम लेते हैं, तो उसमें बचपन की शरारत, गीता का ज्ञान और प्रेम की अनंत धारा एक साथ बहने लगती है।