नई दिल्ली: संसद ने शुक्रवार को फाइनेंस बिल 2026 को मंजूरी दे दी, जिसके साथ ही केंद्रीय बजट 2026-27 के प्रस्तावों को कानूनी मान्यता मिल गई। राज्यसभा ने इस विधेयक को ध्वनि मत से पारित कर लोकसभा को लौटा दिया, जिससे नए वित्तीय वर्ष में बजट प्रावधानों को लागू करने की प्रक्रिया पूरी हो गई। नया वित्तीय वर्ष 1 अप्रैल से शुरू होगा।
इससे पहले लोकसभा ने 25 मार्च को फाइनेंस बिल को 32 संशोधनों के साथ पारित किया था। इसके बाद राज्यसभा में विधेयक पर संक्षिप्त चर्चा हुई, जहां सांसदों ने बजट से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर सवाल उठाए। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सदस्यों के प्रश्नों का जवाब देते हुए सरकार की आर्थिक नीति और बजट प्रावधानों को स्पष्ट किया, जिसके बाद सदन ने बिल को मंजूरी दे दी।
सरकार ने बजट 2026-27 में कुल 53.47 लाख करोड़ रुपये के खर्च का प्रावधान किया है, जो चालू वित्त वर्ष की तुलना में करीब 7.7 प्रतिशत अधिक है। बजट में आर्थिक विकास को गति देने के लिए बुनियादी ढांचे के विकास पर विशेष जोर दिया गया है। इसके तहत 12.2 लाख करोड़ रुपये पूंजीगत व्यय के रूप में खर्च किए जाएंगे, जो पिछले वर्ष के मुकाबले करीब 2.2 लाख करोड़ रुपये ज्यादा है।
वित्त मंत्री ने बताया कि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करने और संभावित जोखिमों को कम करने के लिए सरकार ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर रिस्क डेवलपमेंट फंड’ स्थापित करने की योजना बना रही है।
सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 में राजकोषीय घाटा को घटाकर जीडीपी के 4.3 प्रतिशत तक सीमित रखने का लक्ष्य तय किया है। राजकोषीय घाटा सरकार की कुल आय और कुल खर्च के बीच का अंतर होता है। सरकार का कहना है कि आर्थिक विकास के साथ वित्तीय अनुशासन बनाए रखना उसकी प्राथमिकता है।
घाटे को पूरा करने के लिए सरकार वित्त वर्ष 2027 के दौरान 11.7 लाख करोड़ रुपये का शुद्ध उधार लेने की योजना बना रही है, जबकि कुल बाजार उधारी का अनुमान 17.2 लाख करोड़ रुपये लगाया गया है।
बजट में हाईवे, रेलवे, बंदरगाह और बिजली परियोजनाओं जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ाने के साथ-साथ सात प्रमुख रणनीतिक सेक्टरों में विनिर्माण को प्रोत्साहन देने और एमएसएमई क्षेत्र को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है।
वित्त मंत्री के अनुसार, सरकार सार्वजनिक निवेश को बढ़ावा देने के साथ-साथ वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि देश का कर्ज-से-जीडीपी अनुपात वित्त वर्ष 2025-26 में घटकर 56.1 प्रतिशत हो गया है, जिसे अगले वित्त वर्ष में 55.6 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य रखा गया है।
सरकार का मानना है कि कर्ज अनुपात में कमी से ब्याज भुगतान का दबाव घटेगा और विकास योजनाओं के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध हो सकेंगे।