नई दिल्ली : वित्त मंत्रालय सोमवार को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) के साथ एक उच्च-स्तरीय समीक्षा बैठक आयोजित करने जा रहा है, जिसमें अमेरिका द्वारा एमएसएमई उत्पादों पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ वृद्धि के प्रभाव का विश्लेषण किया जाएगा। बैठक का मुख्य उद्देश्य इस निर्णय से उत्पन्न आर्थिक दबावों को समझना और छोटे एवं मध्यम उद्यमों की ऋण आवश्यकताओं की पूर्ति के उपाय तलाशना होगा।
सूत्रों के अनुसार, वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस) के सचिव एम. नागराजू की अध्यक्षता में होने वाली इस बैठक में बाहरी व्यापारिक चुनौतियों के कारण एमएसएमई सेक्टर पर पड़े असर का मूल्यांकन किया जाएगा। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाएगा कि सरकार की मौजूदा ऋण सहायता योजनाएँ — जैसे मुद्रा योजना और क्रेडिट गारंटी योजनाएँ — सुचारू रूप से जारी रहें।
हाल ही में इंजीनियरिंग सेक्टर के एमएसएमई प्रतिनिधियों ने भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा से भेंट कर अमेरिकी टैरिफ बढ़ोतरी से उत्पन्न संकटों को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने निर्यातकों की उधारी लागत घटाने और क्रेडिट उपलब्धता आसान करने के लिए तत्काल नीति हस्तक्षेप की मांग की थी।
ईईपीसी इंडिया के अध्यक्ष पंकज चड्ढा ने बताया कि भारत का अमेरिका को इंजीनियरिंग निर्यात करीब 20 अरब डॉलर का है, जो देश के कुल इंजीनियरिंग निर्यात का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा है। उन्होंने कहा, “अमेरिकी टैरिफ से हमारे निर्यात क्षेत्र को गहरा झटका लगा है। यह स्थिति सरकारी सहायता और राहत पैकेज की तत्काल आवश्यकता को दर्शाती है।”
एमएसएमई प्रतिनिधियों के अनुसार, बैंकों से वित्त प्राप्त करने में उन्हें लगातार कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। उच्च कोलेटरल मांग और कठोर क्रेडिट रेटिंग प्रणाली के कारण कई छोटे निर्यातक ऋण प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं। इसके अलावा, बैंकों द्वारा जोखिम आकलन में अमेरिकी बाजार की अस्थिरता को शामिल किए जाने से एमएसएमई की क्रेडिट रेटिंग और ब्याज दरें दोनों प्रभावित हुई हैं।
ईईपीसी इंडिया ने सुझाव दिया है कि इस वर्ष के लिए क्रेडिट रेटिंग तय करते समय अमेरिकी टैरिफ से उत्पन्न जोखिमों को रेटिंग गणना से अस्थायी रूप से बाहर रखा जाए, ताकि एमएसएमई को राहत मिल सके और निर्यात प्रतिस्पर्धा बनाए रखी जा सके।