नई दिल्ली : भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर बातचीत तेज़ है, लेकिन इसी बीच रूस से कच्चे तेल की खरीद का मुद्दा फिर से सुर्खियों में आ गया है। इस पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने साफ किया है कि सरकार के लिए सबसे अहम सवाल देश की ऊर्जा सुरक्षा का है और सभी निर्णय उसी कसौटी पर लिए जाते हैं।
विदेश मंत्रालय का कहना है कि भारत अपनी बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए किसी एक देश या स्रोत पर निर्भर नहीं रह सकता। इसी कारण सरकार वैश्विक हालात, बाज़ार की स्थिति और आपूर्ति श्रृंखला को ध्यान में रखते हुए ऊर्जा आयात में विविधता की नीति अपनाए हुए है। हालांकि, रूस से तेल खरीद को लेकर सरकार ने अब भी कोई सीधा रुख सार्वजनिक नहीं किया है।
तेल के सवाल पर टालमटोल जारी
रूसी कच्चे तेल को लेकर उठ रहे सवालों पर सरकार के अलग-अलग विभाग एक-दूसरे की ओर इशारा करते दिख रहे हैं। वाणिज्य मंत्रालय इसे विदेश मंत्रालय का विषय बता रहा है, जबकि विदेश मंत्रालय रणनीतिक और नीतिगत जवाबों तक ही सीमित है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी हाल ही में मीडिया से कहा कि इस मुद्दे पर अंतिम टिप्पणी विदेश मंत्रालय ही करेगा।
ऊर्जा सुरक्षा सरकार की रेड लाइन
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने मीडिया ब्रीफिंग में दोहराया कि 1.4 अरब नागरिकों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि भारत ने यह रुख कई बार सार्वजनिक मंचों पर स्पष्ट किया है और ऊर्जा आयात से जुड़े फैसले इसी आधार पर किए जाते हैं। यह बयान ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका ने भारत पर रूसी तेल खरीद को लेकर लगाए गए 25 प्रतिशत अतिरिक्त आयात शुल्क को वापस ले लिया है।
अमेरिका के दावे और भारत की चुप्पी
अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि भारत ने रूस से तेल आयात कम करने या बंद करने का संकेत दिया है। अंतरिम व्यापार समझौते की घोषणा के बाद से अमेरिका लगातार यह कहता रहा है कि भारत अमेरिका से अधिक ऊर्जा उत्पाद खरीदेगा। इसी कड़ी में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर करते हुए भारत पर लगाया गया दंडात्मक शुल्क औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया।
उस आदेश में कहा गया है कि भारत ने रूस से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से तेल आयात रोकने, अमेरिका से ऊर्जा खरीद बढ़ाने और अगले दशक में रक्षा सहयोग को मजबूत करने पर सहमति जताई है। हालांकि, भारत सरकार ने इन दावों की न तो पुष्टि की है और न ही खंडन।
रणनीति और ज़रूरतों के बीच संतुलन
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत इस समय एक नाज़ुक कूटनीतिक संतुलन साधने की कोशिश में है। एक ओर अमेरिका के साथ व्यापार और रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाना जरूरी है, तो दूसरी ओर ऊर्जा सुरक्षा जैसे मूलभूत राष्ट्रीय हितों से कोई समझौता संभव नहीं है। फिलहाल, रूस से तेल आयात को लेकर भारत का अंतिम रुख क्या होगा, यह आने वाले दिनों में ही साफ हो पाएगा।