नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच जारी टैरिफ विवाद के बीच भारत ने अपनी विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) नीति में रणनीतिक बदलाव करना शुरू कर दिया है। हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि भारत ने पिछले एक साल में अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में अपने निवेश को काफी हद तक घटा दिया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि देश अब अपने विदेशी निवेश को और अधिक विविध बनाने पर ध्यान दे रहा है।
ब्लूमबर्ग के अनुसार, 31 अक्टूबर 2024 से 31 अक्टूबर 2025 के बीच भारत की अमेरिकी ट्रेजरी नोट्स में हिस्सेदारी लगभग 21 प्रतिशत घटकर 241.4 अरब डॉलर से 190.7 अरब डॉलर पर आ गई। यह पिछले चार वर्षों में पहली बार है जब अमेरिकी ट्रेजरी में भारतीय निवेश में सालाना गिरावट दर्ज की गई है। इससे पहले यह निवेश लगातार बढ़ता रहा था या स्थिर बना हुआ था।
विशेष रूप से यह गिरावट ऐसे समय में हुई जब अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड (10-वर्षीय बॉन्ड पर) 4.0 से 4.8 प्रतिशत के बीच थी, जो आम तौर पर विदेशी निवेशकों के लिए आकर्षक मानी जाती है। इसके बावजूद भारत ने अपनी होल्डिंग घटाई, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह कदम केवल रिटर्न (यील्ड) पर आधारित नहीं है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह निर्णय भारत की विदेशी मुद्रा भंडार नीति में बदलाव का हिस्सा है। देश अब अपनी संपत्तियों को केवल अमेरिकी ट्रेजरी पर केंद्रित रखने के बजाय विभिन्न क्षेत्रों और साधनों में निवेश कर जोखिम को कम करने और निवेश पोर्टफोलियो को विविध बनाने की रणनीति अपना रहा है।
इस कदम से संकेत मिलता है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक चुनौतियों के बीच भारत अपनी विदेशी निवेश नीति को अधिक सतर्क और रणनीतिक ढंग से आकार दे रहा है।