नेशनल डेस्क: रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष के बीच रूस में अब एक अलग तरह की महंगाई चर्चा का विषय बन गई है। इस बार बात तेल, गैस या सोने-चांदी की नहीं, बल्कि खीरे की हो रही है। देश के कई हिस्सों में खीरे के दाम अचानक इतनी तेजी से बढ़े हैं कि सोशल मीडिया पर लोग इसे मजाक में “ग्रीन गोल्ड” कहने लगे हैं।
कीमतों में तेज उछाल
ब्रिटिश अखबार The Independent की एक रिपोर्ट के अनुसार, रूस में खीरे की खुदरा कीमतें दिसंबर के मुकाबले लगभग दोगुनी हो गई हैं। कई शहरों में यह 300 रूबल प्रति किलो के आसपास पहुंच गई हैं, जबकि कुछ इलाकों में इससे भी अधिक कीमत वसूली जा रही है।
मीट के बराबर पहुंचे दाम
Forbes Russia की रिपोर्ट बताती है कि फरवरी की शुरुआत तक कुछ सुपरमार्केट में खीरे की कीमतें मांस के बराबर दर्ज की गईं। यहां तक कि कुछ जगहों पर ये केले जैसे आयातित फलों से भी महंगे बिक रहे हैं।
विपक्ष ने सरकार को घेरा
इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। Sergey Mironov, जो A Just Russia पार्टी के नेता हैं, ने सरकार की उस दलील पर सवाल उठाया है जिसमें कीमतों में वृद्धि को केवल मौसमी कारणों का परिणाम बताया गया था। उनका कहना है कि यदि आम नागरिकों को रोजमर्रा की सब्जियां खरीदना भी मुश्किल हो जाए, तो इसे सामान्य उतार-चढ़ाव कहकर टाला नहीं जा सकता।
बढ़ोतरी के पीछे क्या वजह?
विशेषज्ञों के अनुसार, कई कारक एक साथ काम कर रहे हैं:
- युद्धकालीन आर्थिक दबाव: सैन्य खर्च में बढ़ोतरी से अन्य क्षेत्रों पर असर पड़ा है, जिससे सप्लाई चेन प्रभावित हुई है।
- मजदूरों की कमी: सैन्य भर्ती के कारण ग्रीनहाउस और कृषि क्षेत्रों में श्रमिकों की कमी देखी जा रही है।
- टैक्स वृद्धि: 1 जनवरी 2026 से वैट दर 20% से बढ़ाकर 22% कर दी गई, जिससे उपभोक्ता वस्तुओं की लागत बढ़ी है।
- मौसमी प्रभाव: सर्दियों में स्थानीय उत्पादन कम हो जाता है, जिससे कीमतों में सामान्य वृद्धि होती है, हालांकि इस बार उछाल असामान्य रूप से अधिक बताया जा रहा है।
कुल मिलाकर, रूस में खीरे की कीमतों ने बाजार से लेकर राजनीति तक बहस छेड़ दी है। आम उपभोक्ता जहां बढ़ती लागत से परेशान हैं, वहीं विशेषज्ञ इसे व्यापक आर्थिक दबावों का संकेत मान रहे हैं।