देश की पहली LGBTQ सांसद बनीं मेनका गुरुस्वामी, राज्यसभा चुनाव में मिली जीत

भारत की संसदीय राजनीति में एक नया अध्याय जुड़ गया है। सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ लेकर इतिहास रच दिया है। इसके साथ ही वह देश की पहली ऐसी सांसद बन गई हैं, जो खुले तौर पर LGBTQ समुदाय का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसे भारत में लैंगिक विविधता और समान अधिकारों की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

धारा 377 मामले में रही अहम भूमिका

मेनका गुरुस्वामी उन प्रमुख वकीलों में शामिल थीं, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में उस ऐतिहासिक मामले की पैरवी की थी, जिसके परिणामस्वरूप 2018 में भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के एक बड़े हिस्से को निरस्त कर दिया गया। यह फैसला LGBTQ समुदाय के लिए ऐतिहासिक साबित हुआ, क्योंकि इसके बाद सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया।

संवैधानिक मामलों की विशेषज्ञ वकील

सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता के तौर पर पहचान बना चुकी गुरुस्वामी कई महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों में अपनी विशेषज्ञता के लिए जानी जाती हैं। अपने करियर की शुरुआत में उन्होंने भारत के पूर्व अटॉर्नी जनरल Ashok Desai के साथ काम करते हुए कानून के व्यावहारिक पहलुओं को समझा। उनकी उपलब्धियों के कारण उन्हें Kiran Manral की पुस्तक Rising: 30 Women Who Changed India में भी शामिल किया गया है।

विदेशों में की उच्च शिक्षा

कानून की पढ़ाई को आगे बढ़ाने के लिए गुरुस्वामी ने University of Oxford से 2001 में सिविल लॉ (BCL) की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने Harvard University से लॉ में मास्टर्स (LLM) किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने न्यूयॉर्क स्थित अंतरराष्ट्रीय लॉ फर्म Davis Polk & Wardwell में एसोसिएट के रूप में भी काम किया।

उनकी उपलब्धियों के सम्मान में University of Oxford के रोड्स हाउस के मिलनर हॉल में उनका पोर्ट्रेट लगाया गया है। वह यह सम्मान पाने वाली पहली भारतीय और दुनिया की दूसरी महिला हैं।

साथी वकील के साथ लड़ी कानूनी लड़ाई

गुरुस्वामी की जीवनसाथी Arundhati Katju भी पेशे से वकील हैं। दोनों ने मिलकर धारा 377 को चुनौती देने वाली कानूनी लड़ाई में अहम भूमिका निभाई। वर्ष 2009 में Delhi High Court ने इस धारा को निरस्त कर दिया था, लेकिन बाद में मामला फिर से Supreme Court of India पहुंचा।

कई वर्षों तक चली कानूनी लड़ाई के बाद 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया। अब राज्यसभा में उनकी मौजूदगी को LGBTQ समुदाय की आवाज़ के रूप में देखा जा रहा है।

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