डॉ. अरुण मिश्रा लोकतन्त्र प्रहरी के दैनिक पाठक द्वारा भेजे गए पत्र से..
-:सब धरा रह जाएगा:-
मेरा ये है मेरा वो है, बस ये तेरे मन का भरम है !
कोसना खुद को एक दिन, और कहना ये मेरे करम है!!
कोई न आया तेरे संग, कोई न संग तेरे जाएगा!
छींक की तरह आयेगी मौत, रुमाल जेब में रह जाएगा!!
खाली हाथ हुए थे पैदा, फिर बन गए अमीर गरीब!
जिसके पास है जितनी दौलत, क्या वो है खुश नसीब!!
अंत काल आएगा इनका, मुहँ से गंगाजल गिर जाएगा!
छींक की तरह आयेगी मौत, रुमाल जेब में रह जाएगा!!
आली शान महला-दु महला, उसपे मंहगी रसोई !
जानें सब मृत्यु अटल है, पर माने ना कोई!!
हर कोई जाएगा चार कंधे पे, फिर राख में मिल जाएगा!
छींक की तरह आयेगी मौत, रुमाल जेब में रह जाएगा!!
डॉ. अरुण मिश्रा “अकेला”