नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव अब और गंभीर होता नजर आ रहा है। हाल के दिनों में हमलों और जवाबी कार्रवाइयों के कारण पूरे क्षेत्र में हालात बेहद संवेदनशील हो गए हैं। इस स्थिति ने न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाई है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय स्थिरता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
खाड़ी देशों ने संयुक्त राष्ट्र से हस्तक्षेप की अपील
बढ़ते तनाव के बीच कई खाड़ी देशों ने संयुक्त राष्ट्र और उसकी मानवाधिकार परिषद से तुरंत दखल देने की मांग की है। जिनेवा में परिषद के समक्ष पेश किए गए एक राजनयिक नोट में बहरीन, जॉर्डन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने क्षेत्र में नागरिक इलाकों और ऊर्जा ढांचे पर हो रहे हमलों को गंभीर चिंता का विषय बताया है। इन देशों का कहना है कि बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमलों से सुरक्षा के साथ-साथ आम नागरिकों के अधिकार भी प्रभावित हो रहे हैं।
ऊर्जा ठिकानों पर हमलों से बढ़ी चिंता
रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान से जुड़े हमलों में खाड़ी क्षेत्र के तेल और गैस से जुड़े महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाया गया है। इससे अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है। खास तौर पर हॉर्मुज जलडमरूमध्य के संभावित बंद होने की आशंका ने चिंता और बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह अहम समुद्री मार्ग बाधित होता है, तो दुनिया भर में तेल और गैस की आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ सकता है।
कच्चे तेल और गैस की कीमतों में उछाल
तनाव बढ़ने के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। ब्रेंट क्रूड तेल की कीमत करीब 114 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है, जबकि इससे पहले यह 73 डॉलर से कम थी। इसी तरह प्राकृतिक गैस के दामों में भी तेज वृद्धि देखी गई है। कतर की एक प्रमुख गैस सुविधा और कुवैत की रिफाइनरियों पर हमलों के बाद ऊर्जा संकट की आशंका और गहरी हो गई है।
हमले रोकने और मुआवजे की मांग
खाड़ी देशों द्वारा तैयार किए गए मसौदा प्रस्ताव में इन हमलों की कड़ी निंदा की गई है और ईरान से नागरिक ढांचे और वाणिज्यिक जहाजों पर हमले तुरंत रोकने की मांग की गई है। इसके साथ ही हुए नुकसान के लिए मुआवजे की मांग भी उठाई गई है। बताया जा रहा है कि संयुक्त राष्ट्र इस मुद्दे पर आपात बहस आयोजित करने की तारीख तय करने पर विचार कर रहा है।
वैश्विक असर की आशंका
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव जल्द कम नहीं हुआ, तो इसका असर केवल क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और महंगाई पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है, जिससे कई देशों में आर्थिक दबाव बढ़ने की आशंका है।