नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पोंगल पर्व के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में तमिल संस्कृति की ऐतिहासिक और राष्ट्रीय भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि यह परंपरा केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे भारत की सांस्कृतिक धरोहर का अभिन्न हिस्सा है। उन्होंने कहा कि समृद्ध समाज के लिए भोजन, आय और प्रकृति—तीनों के बीच संतुलन जरूरी है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि पोंगल आज सीमाओं से परे जाकर वैश्विक पहचान बना चुका है। दुनिया के अलग-अलग देशों में बसे तमिल समुदाय इस पर्व को उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाते हैं, जिससे भारतीय संस्कृति की सार्वभौमिक स्वीकार्यता झलकती है।
प्रधानमंत्री मोदी ने पोंगल को किसान, प्रकृति और सूर्य के प्रति सम्मान प्रकट करने वाला उत्सव बताया। उन्होंने कहा कि यह पर्व अन्नदाता की मेहनत का सम्मान करता है और हमें यह याद दिलाता है कि धरती, परिवार और समाज के बीच सामंजस्य बनाए रखना कितना जरूरी है।
तमिल संस्कृति से अपने जुड़ाव का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि बीते समय में तमिल विरासत से जुड़े विभिन्न आयोजनों और स्थलों का अनुभव उनके लिए प्रेरणादायक रहा है। उन्होंने प्राचीन मंदिरों, सांस्कृतिक संगमों और ऐतिहासिक धरोहरों का उल्लेख करते हुए कहा कि तमिल परंपरा भारत की सांस्कृतिक विविधता को मजबूती देती है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि तमिल सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी जीवित संस्कृतियों में गिनी जाती है, जिसने समय के साथ खुद को सहेज कर रखा है। उन्होंने जोर दिया कि ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ की भावना को पोंगल जैसे पर्व और अधिक सशक्त बनाते हैं।
पर्यावरण संरक्षण पर बोलते हुए पीएम मोदी ने कहा कि प्रकृति के प्रति सम्मान केवल त्योहारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्होंने लोगों से अपील की कि प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण दैनिक जीवन का हिस्सा बने, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए धरती सुरक्षित रह सके।
उन्होंने कहा कि मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना, जल संरक्षण और संसाधनों का संतुलित उपयोग ही सतत विकास का मार्ग है और यही भविष्य की समृद्धि की कुंजी भी है।