नई दिल्ली | देशभर में तेजी से बढ़ रहे साइबर अपराधों, खासकर “डिजिटल अरेस्ट” के नाम पर हो रही ठगी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराज़गी जताई है। अदालत ने कहा कि ऐसे साइबर गिरोह अब तक 3,000 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी कर चुके हैं, जिनका शिकार आम नागरिकों से लेकर वरिष्ठ नागरिक तक बने हैं। अदालत ने चेतावनी दी कि अगर इस दिशा में तत्काल सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है।
यह टिप्पणी जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की तीन-न्यायाधीशों वाली पीठ ने स्वतः संज्ञान (Suo Motu) मामले की सुनवाई के दौरान की। यह मामला उन साइबर गिरोहों से संबंधित है जो खुद को पुलिस अधिकारी या जज बताकर नकली नोटिस, गिरफ्तारी वारंट या वीडियो कॉल के माध्यम से लोगों को डराकर उनसे वसूली करते हैं।
सुनवाई में यह खुलासा हुआ कि यह साइबर नेटवर्क सिर्फ भारत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि म्यांमार और थाईलैंड जैसे देशों से भी संचालित हो रहे हैं। गृह मंत्रालय की साइबर क्राइम डिवीजन और CBI ने अपनी सीलबंद रिपोर्ट में बताया कि इन अंतरराष्ट्रीय गिरोहों की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है और जांच जारी है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को जानकारी दी कि कई मामलों में CBI ने जांच शुरू कर दी है और गृह मंत्रालय से तकनीकी सहयोग लिया जा रहा है। अदालत ने इस मामले में एक अमिकस क्यूरी (न्यायालय सहायक) भी नियुक्त किया है, ताकि जांच की निगरानी और कानूनी सुझाव दिए जा सकें। अगली सुनवाई 10 नवंबर को निर्धारित की गई है।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से “डिजिटल अरेस्ट” जैसे साइबर अपराधों से संबंधित FIR और जांच की जानकारी मांगी थी। अदालत ने यह भी संकेत दिया है कि यदि आवश्यक हुआ, तो इस पूरे नेटवर्क की जांच CBI को सौंपी जा सकती है, क्योंकि इसका दायरा देश की सीमाओं से परे अंतरराष्ट्रीय स्तर तक फैला हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट की इस सख्ती से उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में ऐसे डिजिटल ठगों के खिलाफ देशव्यापी अभियान चलाया जाएगा और आम नागरिकों को इस नई साइबर ठगी से बचाने के लिए सख्त कानून और त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।