नई दिल्ली : मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के गर्भगृह में वीआईपी प्रवेश को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि महाकाल के सामने सभी भक्त समान हैं और गर्भगृह में किसे प्रवेश मिलेगा, यह निर्णय केवल मंदिर प्रशासन और जिला प्रशासन के अधिकार में आता है।
अदालत का फैसला और निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वे अपनी मांग सीधे मंदिर प्रशासन के समक्ष रखें। अदालत ने कहा, “महाकाल के दरबार में कोई विशेष दर्जा वाला नहीं होता। गर्भगृह में प्रवेश के नियम तय करना मंदिर समिति और जिला प्रशासन का अधिकार है। अदालत इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगी।”
याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ता का आरोप था कि कोरोना काल के बाद आम श्रद्धालुओं के लिए गर्भगृह बंद है, लेकिन इसी दौरान वीआईपी और प्रभावशाली लोग विशेष अनुमति लेकर अंदर जा रहे हैं। उनका कहना था कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है।
हाईकोर्ट ने भी याचिका खारिज की थी
इससे पहले, अगस्त 2025 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने भी इसी तरह की याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने कहा कि गर्भगृह में प्रवेश का फैसला जिला कलेक्टर और मंदिर प्रशासन को ही करना है और अदालत इसमें दखल नहीं दे सकती।
श्रद्धालुओं में नाराजगी
महाकाल मंदिर में आम दर्शन कोरोना काल के बाद से बंद हैं। श्रद्धालु केवल बाहरी क्षेत्र से भगवान महाकाल के दर्शन कर पा रहे हैं। हालांकि, कई बार वीआईपी नेताओं और प्रभावशाली व्यक्तियों को विशेष अनुमति मिल जाने की खबरों से आम भक्तों में नाराजगी देखने को मिली।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब याचिकाकर्ता को मंदिर प्रशासन से बातचीत करके समाधान खोजने की सलाह दी गई है। इस निर्णय से यह संकेत भी मिलता है कि धार्मिक स्थलों के आंतरिक नियमों में अदालत का हस्तक्षेप सीमित होगा, और प्रशासन पर नियमों को पारदर्शी और निष्पक्ष रूप से लागू करने का दबाव बढ़ सकता है।