नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि राज्यपाल किसी भी विधेयक (बिल) पर अनिश्चितकाल तक निर्णय के लिए इंतजार नहीं कर सकते। अदालत ने कहा कि “डीम्ड असेंट” (निर्धारित समय में मंजूरी मान लेना) का सिद्धांत संविधान की भावना के अनुरूप नहीं है, लेकिन बिल को लंबित रखना भी स्वीकार्य नहीं।
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ—जिसमें जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर शामिल थे—ने 10 दिनों की सुनवाई के बाद यह निर्णय सुरक्षित रखा था।
अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 के तहत राज्यपाल के पास केवल तीन विकल्प हैं:
- बिल को मंजूरी देना।
- बिल को पुनर्विचार के लिए विधानसभा को वापस भेजना।
- बिल को राष्ट्रपति के विचार के लिए भेजना।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ‘प्रोवाइजो’ को चौथा विकल्प नहीं माना जा सकता। पीठ ने कहा कि भारतीय संघवाद में यह स्वीकार्य नहीं कि राज्यपाल बिना सदन को लौटाए बिल को अनिश्चितकाल तक रोकें।
फैसले में यह भी कहा गया कि चुनी हुई सरकार और कैबिनेट “ड्राइवर की सीट” में होती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि राज्यपाल का पद केवल औपचारिक है। राज्यपाल और राष्ट्रपति संवैधानिक व्यवस्था में संवाद, सहयोग और संतुलन बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों को टकराव के बजाय सहयोग और संवाद की भावना अपनाने का संदेश दिया, ताकि संघवाद की मूल भावना कायम रह सके।