दुर्ग, 4 दिसंबर। दुर्ग जिले के कोड़ियां गांव में स्थित ऐतिहासिक भूमि फोड़ शिव मंदिर की कहानी बेहद रोचक है। बताया जाता है कि लगभग 200 साल पहले मालगुजारी के दौर में, पानी की समस्या के दौरान कुआं खोदते समय यह शिवलिंग स्वतः ही जमीन से प्रकट हुआ था। ग्रामीणों के अनुसार, प्रारंभ में यह एक नारियल के आकार का पत्थर था, जो समय के साथ बढ़कर वर्तमान शिवलिंग का रूप ले चुका है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, जब गांव में पीने के पानी की किल्लत हुई, तब दाऊ रूपसिंह वर्मा ने कुआं खोदने का आदेश दिया था। खुदाई के दौरान, नारियल के आकार का भूरे रंग का एक पत्थर मिला। तमाम प्रयासों के बावजूद ग्रामीण इसे निकाल नहीं पाए और धीरे-धीरे इसका आकार बढ़ने लगा, जिसे अब ‘भुईयां फोड़’ शिवलिंग के नाम से जाना जाता है।

स्वयंभू शिवलिंग की विशेषता
मंदिर की मुख्य विशेषता यह है कि यहां शिवलिंग स्वयंभू (स्वतः प्रकट) है। गौर से देखने पर, शिवलिंग की शिला का रंग भूरा और रेशेदार दिखाई देता है, जो नारियल की बनावट जैसा प्रतीत होता है।
इसके अलावा 16वीं शताब्दी से जुड़े इस मंदिर में वर्तमान में भगवान गणेश, हनुमान समेत कई अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं, जिन्हें भक्तों ने अपने पूर्वजों के नाम पर स्थापित किया है। भक्तों में गहरी आस्था है कि सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना भगवान शिव यहां जरूर पूरी करते हैं।

धार्मिक आयोजन
मंदिर में सावन के महीने और महाशिवरात्रि के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं। गांव के बीच स्थित यह साधारण सा दिखने वाला मंदिर अपने आप में समृद्ध ऐतिहासिक घटनाओं को समेटे हुए है।