नई दिल्ली : भारत में हवाई यात्रा को सामान्यतः सुरक्षित माना जाता है, लेकिन समय–समय पर हुए कुछ दुखद विमान और हेलीकॉप्टर हादसों ने देश को गहरे शोक में डुबोया है। खासकर जब इन दुर्घटनाओं में राजनीतिक नेतृत्व या सार्वजनिक जीवन से जुड़ी प्रमुख हस्तियों की जान गई, तब इन घटनाओं ने राष्ट्रीय स्तर पर बहस और चिंता को जन्म दिया। ऐसे हादसों ने न केवल परिवारों और समर्थकों को आघात पहुँचाया, बल्कि देश की राजनीति और प्रशासन पर भी दूरगामी प्रभाव छोड़े।
जब हवाई हादसों ने बदला देश का राजनीतिक परिदृश्य
संजय गांधी (23 जून 1980)
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पुत्र और कांग्रेस के उभरते नेता संजय गांधी की दिल्ली में विमान दुर्घटना में मृत्यु हुई। कम उम्र में हुई इस घटना ने भारतीय राजनीति की दिशा ही बदल दी।
माधवराव सिंधिया (30 सितंबर 2001)
कांग्रेस के कद्दावर नेता माधवराव सिंधिया की उत्तर प्रदेश में निजी विमान दुर्घटना में मृत्यु हुई। उनकी सादगी और जनस्वीकृति के कारण यह हादसा पूरे देश के लिए एक बड़ा झटका था।
जी.एम.सी. बालयोगी (3 मार्च 2002)
लोकसभा अध्यक्ष जीएमसी बालयोगी का हेलीकॉप्टर आंध्र प्रदेश में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। वे अपने पीछे संसदीय मर्यादाओं की मजबूत विरासत छोड़ गए।
साइप्रियन संगमा (22 सितंबर 2004)
मेघालय सरकार में मंत्री साइप्रियन संगमा सहित कई लोगों की पवन हंस हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु हुई, जिसने पूर्वोत्तर भारत में हवाई सुरक्षा पर सवाल खड़े किए।
ओम प्रकाश जिंदल और सुरेंद्र सिंह (31 मार्च 2005)
हरियाणा सरकार के दो मंत्रियों की एक साथ हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु ने राज्य प्रशासन को गहरे संकट में डाल दिया।
वाई.एस. राजशेखर रेड्डी (2 सितंबर 2009)
आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वाईएसआर रेड्डी की हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु ने राज्य की राजनीति को पूरी तरह झकझोर दिया। वे जनता के बीच अत्यंत लोकप्रिय थे।
दोरजी खांडू (30 अप्रैल 2011)
अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री दोरजी खांडू का हेलीकॉप्टर हिमालयी क्षेत्र में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। दुर्गम इलाकों में उड़ान की चुनौतियाँ इस हादसे के बाद गंभीर चर्चा का विषय बनीं।
सुरक्षा पर फिर उठते सवाल
इन घटनाओं ने यह स्पष्ट किया कि वीवीआईपी उड़ानों में भी मौसम, तकनीकी खराबी और भौगोलिक चुनौतियाँ गंभीर जोखिम पैदा कर सकती हैं। हर हादसे के बाद जांच और नियमों को सख्त करने की बातें होती हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि निरंतर प्रशिक्षण, आधुनिक तकनीक और पारदर्शी जांच ही भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोक सकती है।