नई दिल्ली: कभी भारतीय डॉक्टरों के लिए करियर का सुनहरा सपना माने जाने वाला ब्रिटेन अब तेजी से अपनी चमक खोता नजर आ रहा है। यूके की नेशनल हेल्थ सर्विस (NHS) में वर्षों तक सेवाएं देने वाले बड़ी संख्या में भारतीय डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी अब वहां से विदा लेने का मन बना रहे हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि जो लोग स्थायी भविष्य की उम्मीद लेकर ब्रिटेन पहुंचे थे, वे अब नए ठिकाने की तलाश में हैं।
काम से नहीं, सिस्टम से परेशानी
दिलचस्प बात यह है कि भारतीय डॉक्टरों को ब्रिटेन के अस्पतालों में काम या इलाज की गुणवत्ता से कोई शिकायत नहीं है। असली समस्या बढ़ती महंगाई, भारी टैक्स बोझ और सख्त होते इमिग्रेशन नियम हैं। एनएचएस से जुड़े कई भारतीय डॉक्टरों का कहना है कि परिवार के साथ सम्मानजनक जीवन जीना अब पहले जितना आसान नहीं रहा। बच्चों की पढ़ाई, घर का किराया और रोजमर्रा के खर्च लगातार बढ़ते जा रहे हैं, जबकि आमदनी उस रफ्तार से नहीं बढ़ रही।
वीजा नियम बने सबसे बड़ी बाधा
बीते कुछ वर्षों में ब्रिटेन ने वीजा नियमों को काफी सख्त कर दिया है। हेल्थ एंड केयर वर्कर वीजा पर निर्भर विदेशी डॉक्टरों के लिए अनिश्चितता बढ़ गई है। परिवार को साथ रखने, स्थायी निवास (PR) पाने और भविष्य की सुरक्षा को लेकर असमंजस बना रहता है। यही कारण है कि कई अनुभवी डॉक्टर अब यूके में लंबे समय तक रुकने को लेकर आश्वस्त नहीं हैं।
ऑस्ट्रेलिया बना नई पसंद
इन परिस्थितियों में ऑस्ट्रेलिया भारतीय डॉक्टरों के लिए सबसे बड़ा विकल्प बनकर उभरा है। वहां बेहतर वेतन, संतुलित वर्क-लाइफ बैलेंस और अपेक्षाकृत सरल इमिग्रेशन प्रक्रिया डॉक्टरों को आकर्षित कर रही है। इसके अलावा कनाडा और मिडिल ईस्ट के देश भी भारतीय स्वास्थ्यकर्मियों के लिए नए अवसर खोल रहे हैं।
आंकड़े भी दे रहे संकेत
सरकारी आंकड़े इस बदलते रुझान की पुष्टि करते हैं। हाल के वर्षों में ब्रिटेन द्वारा भारतीय नागरिकों को जारी किए जाने वाले हेल्थ एंड केयर वर्कर वीजा की संख्या में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। खासतौर पर नर्सिंग सेक्टर में यह कमी और भी ज्यादा दिखाई दे रही है, जो ब्रिटेन के हेल्थ सिस्टम के लिए चिंता का विषय बन सकती है।
ब्रेन ड्रेन का खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यही स्थिति बनी रही, तो ब्रिटेन को विदेशी मेडिकल टैलेंट बनाए रखने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। भारतीय डॉक्टरों का यूके से ऑस्ट्रेलिया की ओर बढ़ता रुझान सिर्फ करियर का बदलाव नहीं, बल्कि वैश्विक हेल्थकेयर सिस्टम में हो रहे बड़े बदलाव का संकेत भी है।