सियासी गलियारों का फॉर्मूला: सत्ता समीकरण साधने में ‘सेटिंग’ क्यों पड़ती है भारी?

कोलकाता : पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ राजनीतिक शब्दावली में एक पुराना लेकिन चर्चित शब्द फिर सुर्खियों में है—‘सेटिंग’। चुनावी मंचों, टीवी डिबेट और सोशल मीडिया तक, यह शब्द आरोप और जवाबी हमलों का अहम हिस्सा बन गया है।

राज्य की सत्तारूढ़ All India Trinamool Congress (टीएमसी), प्रमुख विपक्षी Bharatiya Janata Party (भाजपा) और Communist Party of India (Marxist) के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा—तीनों एक-दूसरे पर पर्दे के पीछे समझौते करने के आरोप लगा रहे हैं।

‘सेटिंग’ का सियासी मतलब क्या?

बंगाल की राजनीति में ‘सेटिंग’ से आशय उन कथित रणनीतिक समझौतों से लगाया जाता है, जिनके जरिए प्रतिद्वंद्वी दल चुनावी लाभ लेने की कोशिश करते हैं। राजनीतिक गलियारों में ‘राम-बाम’, ‘बिजेमूल’ या ‘सीपीमूल’ जैसे जुमले समय-समय पर उछलते रहे हैं, जो संभावित या आरोपित समीकरणों की ओर इशारा करते हैं।

टीएमसी का दावा रहा है कि 2019 के बाद वाम दलों का वोट बैंक भाजपा की ओर खिसका, जिससे भाजपा को बढ़त मिली। वहीं वामपंथी नेता आरोप लगाते हैं कि टीएमसी और भाजपा एक-दूसरे के खिलाफ तीखे बयान देते हुए भी राजनीतिक रूप से एक-दूसरे के अस्तित्व से लाभ उठाते हैं।

नेताओं के बयान और बढ़ती तल्खी

टीएमसी प्रवक्ता Kunal Ghosh ने ‘सेटिंग’ के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि राजनीतिक जमीन कमजोर होने पर विपक्ष ऐसे नैरेटिव गढ़ता है।

भाजपा की ओर से प्रदेश अध्यक्ष Samik Bhattacharya का कहना है कि कई सीटों पर विपक्षी मतों का विभाजन सत्ताधारी दल को अप्रत्यक्ष लाभ पहुंचाता है।

सीपीआई(एम) नेता Sujan Chakraborty ने भाजपा और टीएमसी पर ‘डर की राजनीति’ करने का आरोप लगाया है। वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता Adhir Ranjan Chowdhury का कहना है कि जब वैचारिक बहस कमजोर पड़ती है, तब ‘सेटिंग’ जैसे आरोप उभरते हैं।

इसी बीच निलंबित टीएमसी विधायक Humayun Kabir द्वारा नई पार्टी ‘जनता उन्नयन पार्टी’ की घोषणा ने भी सियासी अटकलों को हवा दी है। कुछ दलों का आरोप है कि छोटे या नए दल वोट कटवा की भूमिका निभाते हैं, हालांकि संबंधित दल इन दावों से इनकार करते हैं।

पुरानी परंपरा, नई बहस

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल में ‘सेटिंग’ का विमर्श नया नहीं है। 1960 और 70 के दशक में भी गठबंधन सरकारों के दौर में इसी तरह के आरोप लगते रहे। समय के साथ राजनीतिक परिदृश्य बदला, लेकिन आरोपों की प्रकृति लगभग वैसी ही बनी रही।

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे आरोपों को हमेशा ठोस प्रमाण की जरूरत नहीं होती—जांच एजेंसियों की कार्रवाई, राजनीतिक चुप्पी या सीटों के अप्रत्याशित नतीजे—ये सभी अटकलों को जन्म देते हैं।

2026 के चुनाव नजदीक आते ही यह स्पष्ट है कि बंगाल की सियासत में ‘सेटिंग’ का मुद्दा सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह चुनावी रणनीति और जनमत को प्रभावित करने वाला अहम नैरेटिव बन सकता है।

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