कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बूथ-स्तरीय आंकड़ों ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) की जमीनी ताकत को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) द्वारा जारी डेटा के अनुसार पार्टी के 36 शीर्ष नेताओं में से केवल 14 ही अपनी सीट बचा सके, जबकि 22 दिग्गजों को करारी हार का सामना करना पड़ा।
आंकड़े बताते हैं कि इस चुनावी मुकाबले में कई ऐसे दिग्गज भी अपनी सीटों पर पिछड़ गए, जिन्हें अपने ही क्षेत्रों में मजबूत पकड़ वाला माना जाता था। कई नेताओं की स्थिति ऐसी रही कि वे आधे से भी कम बूथों पर बढ़त हासिल कर पाए, जिससे हार का अंतर और अधिक स्पष्ट हो गया।
सबसे चौंकाने वाली तस्वीर भवानीपुर सीट से सामने आई, जहां टीएमसी प्रमुख को उनके ही पारंपरिक गढ़ में कड़ी टक्कर मिली। कुल बूथों में से वह सीमित संख्या में ही बढ़त बना पाईं, जबकि विपक्षी उम्मीदवार ने अधिकांश बूथों पर मजबूत प्रदर्शन किया।
इसी तरह ममता सरकार के चार प्रमुख मंत्रियों को भी भारी झटका लगा। वे अपनी-अपनी सीटों के बड़े हिस्से में बढ़त बनाने में असफल रहे और कई बूथों पर उनका वोट शेयर बेहद कमजोर रहा। इसके विपरीत, कुछ मंत्रियों ने जरूर मजबूत प्रदर्शन कर पार्टी की लाज बचाई।
डेटा यह भी दिखाता है कि कई हाई-प्रोफाइल सीटों पर भाजपा ने बूथ-स्तर की सूक्ष्म रणनीति के दम पर सीमित क्षेत्रों में भी निर्णायक बढ़त बनाकर पूरी सीट पर कब्जा जमाया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव केवल बड़े वोट अंतर का नहीं, बल्कि बूथ-स्तर की गहरी रणनीति और बदलते जमीनी समीकरणों का परिणाम रहा।
कुल मिलाकर, आंकड़े बताते हैं कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार मुकाबला सिर्फ चुनावी नहीं, बल्कि माइक्रो-मैनेजमेंट और संगठनात्मक पकड़ की परीक्षा भी बन गया था।