Hareli Tihar 2026 : छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति और कृषि परंपराओं में हरेली तिहार का विशेष महत्व है। इसे छत्तीसगढ़ का पहला और प्रमुख लोकपर्व माना जाता है। सावन माह की अमावस्या के दिन मनाया जाने वाला यह त्योहार प्रकृति, खेती-किसानी और ग्रामीण जीवन के बीच गहरे संबंध को दर्शाता है।
हरेली का अर्थ चारों ओर फैली हरियाली से जुड़ा है। किसान खेती में जुताई-बोआई, रोपाई और बियासी जैसे शुरुआती कृषि कार्य पूरे करने के बाद इस पर्व को उत्साह के साथ मनाते हैं। यह त्योहार अच्छी फसल, सुख-समृद्धि और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी है।
प्रकृति और कृषि औजारों की होती है पूजा
हरेली के दिन किसान अपने हल-नांगर, कुदाली, फावड़ा, गैंती सहित खेती में उपयोग होने वाले अन्य औजारों की साफ-सफाई करते हैं। इसके बाद विधि-विधान से इनकी पूजा की जाती है। साथ ही कुलदेवता और आराध्य देवी-देवताओं की भी पूजा-अर्चना की जाती है।
इस दिन गाय, बैल और भैंस जैसे पशुओं को भी नहलाकर साफ-सुथरा किया जाता है। कृषि और पशुधन के प्रति सम्मान की यह परंपरा हरेली को अन्य त्योहारों से अलग पहचान देती है।
घर-घर बनते हैं पारंपरिक पकवान
हरेली के अवसर पर घरों में तरह-तरह के पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं। गुड़ का चीला और चावल के आटे से बनी चीला रोटी इस पर्व के प्रमुख व्यंजनों में शामिल हैं। पूजा के बाद कृषि औजारों को धूप-दीप दिखाकर गुड़ के चीले और नारियल का भोग लगाया जाता है।
परिवार के लोग मिलकर पूजा-अर्चना करते हैं और त्योहार की खुशियां साझा करते हैं।
गेड़ी चढ़ने की परंपरा है खास
हरेली तिहार का सबसे आकर्षक हिस्सा गेड़ी है। गांवों में बच्चे और युवा कई फीट ऊंची गेड़ी तैयार करते हैं और उस पर चढ़कर गांव में घूमते हैं। कई जगहों पर गेड़ी दौड़ जैसी प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं।
बच्चों से लेकर युवाओं तक गेड़ी को लेकर खास उत्साह देखने को मिलता है। यह परंपरा छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जीवन और लोक संस्कृति की जीवंत पहचान बन चुकी है।
घरों के दरवाजे पर लगाई जाती है नीम की टहनी
हरेली पर लोग अपने घरों के प्रवेश द्वार पर नीम की टहनियां लगाते हैं। कई स्थानों पर खेतों में भेलवा पेड़ की शाखाएं लगाने की भी परंपरा है। नीम को औषधीय गुणों और कीट नियंत्रण से जोड़कर देखा जाता है।
लोकमान्यता के अनुसार घर के दरवाजे पर नीम की टहनी लगाने से बीमारियों और अनिष्ट से रक्षा होती है। कई जगह लोहार परिवारों के मुख्य द्वार पर नीम की पत्तियां लगाकर और चौखट में कील ठोंककर आशीर्वाद देते हैं।
नारियल फेंक प्रतियोगिता में दिखता है उत्साह
हरेली के मौके पर गांवों और शहरों में नारियल फेंक प्रतियोगिता भी आयोजित की जाती है। पूजा-अर्चना के बाद युवा चौक-चौराहों पर एकत्रित होकर प्रतियोगिता में हिस्सा लेते हैं। प्रतिभागी नारियल को अधिक से अधिक दूरी तक फेंकने का प्रयास करते हैं।
इस पारंपरिक खेल में जीत-हार का सिलसिला देर तक चलता है और पूरा माहौल उत्सव एवं उल्लास से भर जाता है।
प्रकृति, खेती और संस्कृति का संगम
हरेली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि और छत्तीसगढ़ी लोकजीवन के बीच के गहरे संबंध का प्रतीक है। पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं इस पर्व के जरिए आज भी जीवित हैं। कृषि औजारों की पूजा से लेकर गेड़ी, पारंपरिक पकवान और लोक खेलों तक, हरेली तिहार छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करता है।