नेपाल में बाढ़ की भारी तबाही, 260 साल पुराना हिमालयी कॉरिडोर तबाह; भारत-चीन और तिब्बत के बीच व्यापारिक संपर्क टूटा

काठमांडू। नेपाल में आई अचानक बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र में भारी तबाही मचा दी है। भारत-चीन और तिब्बत के बीच सदियों से व्यापार का अहम मार्ग रहे रसुवागढ़ी हिमालयी कॉरिडोर को बाढ़ से गंभीर नुकसान पहुंचा है। 260 साल से अधिक पुराना यह ट्रांस-हिमालयी रास्ता कभी व्यापारियों, तीर्थयात्रियों और सेनाओं की आवाजाही का प्रमुख मार्ग हुआ करता था। आधुनिक दौर में यही कॉरिडोर चीन से नेपाल आने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़े, जूते और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए प्रमुख प्रवेश द्वार बन गया था।

खच्चरों के काफिलों से शुरू हुआ था व्यापार

भोटे कोशी घाटी में ट्रकों की आवाजाही शुरू होने से सदियों पहले इस मार्ग से खच्चरों के काफिले नेपाल से उत्तर की ओर ग्यिरोंग तक जाते थे। व्यापारी वहां चावल और अन्य अनाज पहुंचाते थे और बदले में तिब्बती नमक तथा ऊन लेकर लौटते थे। नेपाल की मध्य पहाड़ियों में नमक की भारी मांग थी, जिसे आगे दक्षिण की ओर भारत तक पहुंचाया जाता था।

नेवार व्यापारी समुदाय के लोग भी तिब्बत के प्रमुख व्यापारिक कस्बों में बस गए थे। इस तरह रसुवागढ़ी मार्ग केवल सामान की आवाजाही का रास्ता नहीं, बल्कि नेपाल, तिब्बत और भारत के बीच आर्थिक और सांस्कृतिक संपर्क की महत्वपूर्ण कड़ी बन गया था।

रणनीतिक महत्व भी रहा बेहद अहम

रसुवागढ़ी कॉरिडोर का महत्व केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहा। वर्ष 1744 में गोरखा ने नुवाकोट पर कब्जा किया, जिसका एक उद्देश्य तिब्बत के साथ होने वाले लाभदायक व्यापार पर नियंत्रण हासिल करना भी था। इसके बाद 1788 और 1791 में तिब्बत पर नेपाली हमलों के दौरान भी इसी मार्ग का इस्तेमाल किया गया। 1792 में चीनी और तिब्बती सेनाओं की जवाबी कार्रवाई के बाद क्षेत्र का रणनीतिक महत्व और बढ़ गया।

1855 में एक और सैन्य अभियान की तैयारी के दौरान जंग बहादुर राणा ने रसुवागढ़ी किला बनवाया। करीब 171 साल पुराना यह ऐतिहासिक किला आज भी आधुनिक रसुवागढ़ी-ग्यिरोंग सीमा शुल्क क्रॉसिंग के पास मौजूद है।

आधुनिक दौर में EV और आयात का बड़ा रास्ता बना

1950 के बाद राजनीतिक बदलाव और नई सड़कों के निर्माण के साथ धीरे-धीरे पारंपरिक कारवां आधारित व्यापार खत्म हुआ। हालांकि, हिमालयी रास्ते से व्यापार पूरी तरह बंद नहीं हुआ, बल्कि उसका स्वरूप बदल गया।

हाल के वर्षों में रसुवागढ़ी नेपाल में चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती मांग के कारण एक महत्वपूर्ण प्रवेश बिंदु बन गया। रसुवा कस्टम्स के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में इस सीमा क्रॉसिंग के जरिए 6,500 से अधिक चीनी इलेक्ट्रिक कारें, जीप, वैन और मिनीबस नेपाल पहुंचीं।

कस्टम्स क्षेत्र में आयातित वाहनों की बड़ी संख्या के कारण यह छोटा हिमालयी इलाका अक्सर वाहनों के अस्थायी डिपो में बदल जाता था। इसी वजह से बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा के दौरान नुकसान का जोखिम भी बढ़ गया।

2025 की बाढ़ में भी बह गई थीं कई गाड़ियां

जुलाई 2025 की बाढ़ में रसुवागढ़ी क्षेत्र को पहले ही भारी नुकसान हुआ था। हाल ही में आयात की गई कई इलेक्ट्रिक और कार्गो गाड़ियां बाढ़ के पानी में बह गई थीं। इसके बावजूद सीमा क्षेत्र में बड़ी संख्या में वाहन और सामान जमा होता रहा।

अब आई नई बाढ़ ने तबाही को और बढ़ा दिया है। तिमुरे नदी के किनारे रखे सैकड़ों 40 फीट लंबे शिपिंग कंटेनर तेज बहाव में बहने लगे। भारी कंटेनर नदी में तैरते हुए पुल के खंभों, सड़क किनारों और बिजली के ट्रांसमिशन टावरों से टकराते रहे। इससे बुनियादी ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंचा।

फ्रेंडशिप ब्रिज भी हुआ ध्वस्त

बाढ़ की सबसे बड़ी मार ल्हेन्डे/कोशी नदी पर बने मितरी संघु यानी फ्रेंडशिप ब्रिज पर पड़ी। 2015 के भूकंप के बाद दोबारा बनाए गए इस पुल की 2025 की बाढ़ के बाद मरम्मत भी की गई थी। लेकिन इस बार तेज बाढ़ के सामने पुल के सहारे कुछ ही सेकंड में ढह गए।

पुल के टूटने से नेपाल और चीन के बीच जमीनी संपर्क बाधित हो गया है। यही वह ऐतिहासिक रास्ता है, जिसके जरिए सदियों पहले तिब्बत से नमक और ऊन नेपाल आते थे और नेपाल से चावल तथा अन्य अनाज उत्तर की ओर भेजे जाते थे।

रसुवागढ़ी कॉरिडोर की मौजूदा तबाही इस बात को भी रेखांकित करती है कि सदियों पुराने इस रणनीतिक और व्यापारिक मार्ग का महत्व आज भी खत्म नहीं हुआ है। फर्क सिर्फ इतना है कि खच्चरों के पुराने काफिलों की जगह अब कंटेनर, ट्रक और इलेक्ट्रिक वाहन इस हिमालयी रास्ते से गुजरते हैं।

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