UN में होर्मुज संकट पर भारत की दो टूक, समुद्री व्यापार को तनाव का निशाना न बनाने की अपील

नई दिल्ली होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी तनाव के बीच भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में समुद्री व्यापार और नाविकों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है। भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने कहा कि व्यापारिक जहाजों को भू-राजनीतिक तनाव का निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत नौवहन की स्वतंत्रता और सुरक्षित समुद्री मार्गों के सम्मान की अपील की।

बहरीन की ओर से बुलाई गई सुरक्षा परिषद की ‘आरिया-फॉर्मूला’ बैठक में हरीश ने कहा कि भारत एक प्रमुख समुद्री राष्ट्र है और स्वतंत्र, खुले, सुरक्षित तथा नियम आधारित समुद्री क्षेत्र का समर्थन करता है। उन्होंने कहा कि जहाजों के नौवहन के अधिकार पर जबरदस्ती, धमकी, गैरकानूनी प्रतिबंध या मनमाने हस्तक्षेप का असर नहीं पड़ना चाहिए।

भारत ने कहा कि प्रमुख समुद्री मार्गों में किसी भी तरह की रुकावट का असर केवल संबंधित क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। इससे वैकल्पिक समुद्री मार्गों पर दबाव बढ़ सकता है, माल ढुलाई और बीमा की लागत बढ़ सकती है तथा ऊर्जा और खाद्य आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसका असर विकासशील देशों पर भी पड़ने की आशंका है।

हरीश ने होर्मुज संकट के दौरान भारतीय नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि संघर्ष वाले क्षेत्रों में फंसे समुद्री यात्रियों की सुरक्षित निकासी, चिकित्सा सहायता, चालक दल में बदलाव और स्वदेश वापसी के लिए प्रभावी अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी है।

भारत के अनुसार, उसकी समुद्री सुरक्षा गतिविधियों के तहत 14 सितंबर तक अदन की खाड़ी और लाल सागर से 449 से अधिक व्यापारिक जहाजों को सुरक्षित गुजरने में मदद मिली। इन जहाजों में करीब 20.3 मिलियन मीट्रिक टन कार्गो और तेल था, जिसकी कीमत 8.4 अरब डॉलर से अधिक बताई गई।

हरीश ने पश्चिमी अरब सागर में भारतीय नौसेना की ‘ऑपरेशन ऊर्जा सुरक्षा’ का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में सुरक्षा स्थिति बिगड़ने के बाद व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा के लिए 13 मार्च तक भारतीय नौसेना की 11 इकाइयों को क्षेत्र में तैनात किया गया था।

भारत ने समुद्री सुरक्षा के सामने उभर रहे नए खतरों को लेकर भी आगाह किया। इनमें बिना चालक वाले सिस्टम से होने वाले हमले, साइबर जोखिम तथा नेविगेशन और संचार में हस्तक्षेप शामिल हैं। भारत ने इन चुनौतियों से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग, क्षमता निर्माण और तकनीक के जिम्मेदार इस्तेमाल पर जोर दिया।

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