जीवित्पुत्रिका व्रत में जितिया धागे का क्या है महत्व? जानिए धार्मिक मान्यता

धर्म डेस्क। संतान की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और मंगलकामना के लिए माताओं द्वारा रखा जाने वाला जीवित्पुत्रिका व्रत हिंदू धर्म की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में शामिल है। इसे जितिया या जिउतिया व्रत के नाम से भी जाना जाता है। इस व्रत में भगवान जीमूतवाहन की पूजा के साथ कई पारंपरिक रीति-रिवाज निभाए जाते हैं। इन्हीं में से एक है जितिया धागा धारण करना।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूजा के बाद लाल या पीले रंग का धागा धारण करना संतान की सुरक्षा और उनके सुखी जीवन की कामना का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, यह एक धार्मिक परंपरा और आस्था से जुड़ी मान्यता है।

संतान की मंगलकामना का प्रतीक

व्रत रखने वाली माताएं पूजा के दौरान भगवान जीमूतवाहन को धागा अर्पित करती हैं। पूजा पूरी होने के बाद इसे अपनी कलाई या गले में धारण किया जाता है। मान्यता है कि धागा बांधते समय माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए प्रार्थना करती हैं।

जितिया धागे को मां के अपने बच्चों के प्रति स्नेह और समर्पण का प्रतीक भी माना जाता है। धार्मिक कथाओं में भगवान जीमूतवाहन द्वारा नागवंश की रक्षा किए जाने का उल्लेख मिलता है। इसी परंपरा और कथा से जीवित्पुत्रिका व्रत की धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं।

कहां धारण किया जाता है जितिया धागा?

परंपरा के अनुसार, जितिया धागे को कलाई या गले में पहना जाता है। इसमें एक विशेष लॉकेट भी पिरोया जा सकता है। कई स्थानों पर संतान की संख्या के आधार पर धागे में गांठ लगाने की परंपरा भी प्रचलित है। आमतौर पर लाल या पीले रंग के धागे का इस्तेमाल किया जाता है।

कितने समय तक पहनते हैं?

मान्यताओं के अनुसार, पूजा के बाद इस धागे को कम से कम 24 घंटे तक धारण करने की परंपरा है। कुछ महिलाएं इसे इससे अधिक समय तक भी पहनकर रखती हैं। धागा उतारने को लेकर भी अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय परंपराएं देखने को मिलती हैं।

कुछ मान्यताओं में रविवार और मंगलवार को धागा न उतारने की बात कही गई है। पुराने धागे को कूड़े में फेंकने के बजाय श्रद्धापूर्वक नदी में प्रवाहित करने या किसी पेड़ के नीचे रखने की परंपरा भी कुछ स्थानों पर बताई जाती है।

कुल मिलाकर, जीवित्पुत्रिका व्रत में जितिया धागा संतान की मंगलकामना, सुरक्षा और मां के संकल्प का प्रतीक माना जाता है। इसके नियम और धारण करने की परंपरा अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हो सकती है, इसलिए स्थानीय मान्यता के अनुसार इसका पालन किया जाता है।

अस्वीकरण: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। इसे अंतिम सत्य या वैज्ञानिक प्रमाण के रूप में न लें। किसी भी धार्मिक परंपरा का पालन स्थानीय मान्यता और अपने विवेक के अनुसार करें।

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